मौर्य वंश का इतिहास सामान्य ज्ञान Maurya Vansh ka Itihas Hindi

Maurya Dynasty | Ancient History of India | UPSC, PSC, Bank, Railway, Police, SSC, 2021

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चन्द्रगुप्त मौर्य

  • मौर्य वंश का संस्थापक चन्द्रगुप्त मौर्य था। इसने मगध के नन्द वंश के अंतिम शासक घनानन्द | को युद्ध में परास्त कर मगध पर एक नये वंश के रूप में मौर्य वंश की स्थापना की थी।
  • जस्टिन ने चन्द्रगुप्त मौर्य को सेण्ड्रोकोट्स एवं प्लूटार्क ने एण्ड्रोकट्स से सम्बोधित किया है।
  • सर्वप्रथम विलियम जोन्स ने सेण्ड्रोकोट्स की पहचान चन्द्रगुप्त मौर्य के रूप में की।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य का जन्म 345 ई.पू. में हुआ था। ३ घनानन्द को परास्त करने में चाणक्य ने चन्द्रगुप्त मौर्य की मदद की थी, जो बाद में चन्द्रगुप्त का प्रधानमन्त्री बना।
  • चन्द्रगुप्त 322 ई.पू. में मगध की राजगद्दी पर बैठा।
  • चन्द्रगुप्त जैन धर्म का अनुयायी था। उसने जैन धर्म गुरु भद्रबाहु से जैन धर्म की दीक्षा ली थी।  
  • चन्द्रगुप्त ने अपने जीवन का अंतिम समय कर्नाटक के श्रवणबेलगोला नामक स्थान पर बिताया।
  • 305 ई.पू. में चन्द्रगुप्त ने सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस निकेटर को हराया।
  • सेल्यूकस निकेटर ने अपनी पुत्री कार्नेलिया की शादी चन्द्रगुप्त मौर्य के साथ कर दी और युद्ध की संधि के शर्तों के अनुसार चार प्रांत- काबुल, कंधार, हेरात एवं मकरान चन्द्रगुप्त को दिये।
  • चन्द्रगुप्त ने 500 हाथी उपहारस्वरूप सेल्यूकस को भेजे। इस उपहार का उल्लेख प्लूटार्क भी करता है।
  • मेगास्थनीज सेल्यूकस निकेटर का राजदूत था, जो चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में रहता था।
  • मेगास्थनीज द्वारा लिखी गयी पुस्तक इंडिका में चन्द्रगुप्त मौर्य के जीवन, पाटलिपुत्र, इसकी प्रशासनिक व्यवस्था और अन्य विषयों का उल्लेख मिलता है।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य और सेल्यूकस के बीच हुए युद्ध का वर्णन एप्पियस ने किया है।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य की मृत्यु 298 ई.पू. में श्रवणबेलगोला में उपवास द्वारा हुई।

बिन्दुसार का इतिहास

  • चन्द्रगुप्त मौर्य का उत्तराधिकारी बिन्दुसार हुआ, जो 298 ई.पू. में मगध के राजसिंहासन पर बैठा।
  • बिन्दुसार अमित्रघात या अमित्रखाद (शत्रुओं का संहारक) के नाम से भी जाना जाता है।
  • बिन्दुसार के अन्य नाम भी मिलते हैं – अमित्रकेटे, अल्लित्रोशेड्स, अमित्रचेत्स, सिंहसेन इत्यादि।
  • पुराणों के अनुसार 24 वर्षों तक जबकि बौद्ध ग्रन्थ महावंश के अनुसार 27 वर्षों तक राज्य बिन्दुसार ने किया।
  • वायुपुराण में बिन्दुसार को भद्रसार या वारिसार कहा गया है।
  • तिब्बती इतिहासकार लामा तारानाथ और बौद्ध ग्रन्थ आर्यमंजुश्रीमूलकल्प के अनुसार चन्द्रगुप्त के पश्चात् भी कुछ समय तक चाणक्य बिन्दुसार का प्रधानमन्त्री बना रहा।
  • स्टैबो के अनुसार यूनानी शासक एण्टियोकस ने बिन्दुसार के दरबार में डाइमेकस नामक राजदूत भेजा। इसे ही मेगास्थनीज का उत्तराधिकारी माना जाता है।
  • प्लिनी के अनुसार मिस्र का राजा फिलाडेल्फस (टॉलमी II) ने पाटलिपुत्र में डियानीसियस नाम का एक राजदूत भेजा था।
  • जैन ग्रन्थों में बिन्दुसार को सिंहसेन कहा गया है।
  • बिन्दुसार के शासनकाल में तक्षशिला में हुए दो विद्रोहों का वर्णन मिलता है। इस विद्रोह को दबाने के लिए बिन्दुसार ने पहले अशोक को और बाद में सुसीम को भेजा।
  • एथीनियस के अनुसार बिन्दुसार ने सीरिया के शासक एण्टियोकस से मधुर मदिरा, सूखे अंजीर एवं एक दार्शनिक भेजने की प्रार्थना की थी। सीरिया के शासक ने बिन्दुसार की प्रथम दो माँगें मान ली, परन्तु दार्शनिक नहीं भेज सका।
  • तिब्बती बौद्ध विद्वान तारानाथ ने बिन्दुसार को 16 राज्यों का विजेता बताया है।
  • बिन्दुसार के शासन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने अपने पिता के साम्राज्य की निष्ठापूर्वक रक्षा की तथा इसे विरासत के रूप में अपने पुत्र अशोक के लिए सुरक्षित रखा

अशोक का इतिहास

  • बिन्दुसार का उत्तराधिकारी अशोक महान हुआ जो 269 ई.पू. में मगध की राजगद्दी पर बैठा।
  • राजगद्दी पर बैठने के समय अशोक अवंती का राज्यपाल था।
  • मास्की एवं गुर्जरा अभिलेख में अशोक का नाम अशोक मिलता है। ३ पुराणों में अशोक को अशोकवर्धन कहा गया है।
  • अशोक ने अपने राज्याभिषेक के आठवें वर्ष लगभग 261 ई.पू. में कलिंग पर आक्रमण किया | और कलिंग की राजधानी तोसली पर अधिकार कर लिया।
  • अशोक को उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु ने बौद्ध धर्म की दीक्षा दी थी। ३ अशोक ने आजीवकों को रहने हेतु बिहार राज्य के गया जिला के अन्तर्गत बराबर की पहाड़ियों
  • में चार गुफाओं (वर्तमान में बराबर पहाड़ी की ये गुफाएं जहानाबाद में स्थित है) का निर्माण करवाया। इन गुफाओं के नाम क्रमश: हैं – कर्ण, चोपार, सुदामा तथा विश्व-झोपड़ी।
  • अशोक की माता का नाम सुभद्रांगी था।
  • अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा।
  • भारत में शिलालेख का प्रचलन सर्वप्रथम अशोक ने किया।  
  • अशोक के शिलालेखों में ब्राह्मी, खरोष्ठी एवं अरामाइक लिपि का प्रयोग हुआ है।
  • ग्रीक एवं अरामाइक लिपि का अभिलेख अफगानिस्तान में, खरोष्ठी लिपि का अभिलेख उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान में और शेष भारत से ब्राह्मी लिपि में अभिलेख प्राप्त हुए हैं।
  • अफगानिस्तान के लगभग से प्राप्त पुलेदारूत शिलालेख आरामाइक लिपि में है।
  • अशोक के अभिलेखों से उसकी गृह, विदेश नीति, साम्राज्य विस्तार एवं प्रशासन पर काफी प्रकाश पड़ता है।
  • अशोक के अभिलेखों को तीन भागों में बाँटा जा सकता है
  1. शिलालेख (Rock-edict)
  2. स्तम्भ लेख (Pillar-edict)
  3. गुहा लेख (Cave-inscriptions)
  • अशोक के शिलालेख की खोज 1750 ई.पू. में टीफैनथेलर ने की थी। इनकी संख्या 14 है।
  • सर्वप्रथम जेम्स प्रिंसेप को 1837 में अशोक के अभिलेख को पढ़ने में सफलता मिली।
  1. अशोक के शिलालेख (Rock-edicts)

  • अशोक के शिलालेखों की संख्या 14 है, जो आठ अलग-अलग स्थानों से मिले हैं। इन 14 शिलालेखों में वर्णित बातें निम्न है
  • पहला शिलालेख– इसमें अशोक ने पशुबलि की निंदा की है।
  • दूसरा शिलालेख- इसमें अशोक ने मनुष्य और पशु दोनों की चिकित्सा व्यवस्था का उल्लेख किया है।
  • तीसरा शिलालेख– इसमें राजकीय अधिकारियों को यह आदेश दिया गया है कि वे प्रति पाँचवें वर्ष  के उपरांत दौरों पर जायें। इस शिलालेख में कुछ धार्मिक नियमों का भी उल्लेख किया गया है।
  • ४ शिलालेख
  • पंचम शिलालेख– इसमें धर्म महामात्रों की नियुक्ति के विषय में जानकारी मिलती है।
  • छठा शिलालेख– इसमें आत्म-नियन्त्रण की शिक्षा दी गयी है।
  • सातवाँ एवं आठवाँ शिलालेख– इसमें अशोक को की तीर्थ यात्राओं का उल्लेख किया है।
  • नौवाँ शिलालेख– इसमें सच्ची भेट एवं सच्चे |कलिंग राज्य के प्रति अशोक की शासन शिष्टाचार का उल्लेख है।
  • दसवाँ शिलालेख- इसके माध्यम से अशोक ने यह आदेश दिया है कि राजा तथा उच्च  पदाधिकारी हर क्षण प्रजा के हित के बारे में सोचें।
  • ग्यारहवाँ शिलालेख– इसमें धर्म के वरदान को सर्वोत्कृष्ट बताया गया है।
  • बारहवाँ शिलालेख- इसमें सभी प्रकार के विचारों के समान होने की बात कही गयी है।
  • तेरहवाँ शिलालेख– इसमें कलिंग युद्ध का वर्णन एवं अशोक के हृदय परिवर्तन की बात कही गयी है।
  • चौदहवाँ शिलालेख- इसमें अशोक ने जनता को धार्मिक जीवन जीने के लिए प्रेरित किया है। लघु शिलालेख
  • लघु शिलालेखों के माध्यम से अशोक के व्यक्तिगत जीवन के इतिहास के विषय में जानकारी मिलती है। अशोक के लघु शिलालेख निम्न प्रकार से हैंक्र. सं. लघु शिलालेख

अशोक के स्तंभ लेख (Pillar-edicts)

इनकी कुल संख्या 7 है। ये लेख छ: अलग-अलग स्थानों से मिले हैं। ये लेखक निम्न हैं

  1. प्रयाग स्तंभ लेख- यह पहले कौशांबी में स्थित था। इसे रानी का अभिलेख भी कहा जाता है। इस स्तंभ लेख को मुगल सम्राट अकबर ने इलाहाबाद के किले में स्थापित करवाया।
  2. दिल्ली-टोपरा- यह स्तंभ लेख फिरोजशाह तुगलक द्वारा पंजाब के टोपरा से दिल्ली लाया गया। इस पर अशोक के सातों अभिलेखों का उल्लेख है।
  3. दिल्ली मेरठ- पहले मेरठ में स्थित यह स्तंभ लेख फिरोजशाह तुगलक द्वारा दिल्ली लाया गया। इसकी खोज 1750 ई. में टीफैनथेलर द्वारा की गयी।
  4. रामपुरवा- यह स्तंभ लेख बिहार राज्य के पश्चिम चंपारण जिला में स्थित है। इसकी खोज 1872 में कारलायल ने की थी। इस स्तंभ लेख पर वृषभ की मूर्ति है।

5.लौरिया अरेराज- यह बिहार राज्य के पूर्वी चंपारण जिले में स्थित है।

  1. लौरिया नंदनगढ़- यह भी बिहार राज्य के पश्चिम चंपारण जिले में स्थित है। इस स्तंभ लेख पर मोर का चित्र बना है।

लघु-स्तंभ लेख

  • सभी लघु-स्तंभ लेखों पर अशोक की राजकीय घोषणाओं का उल्लेख है।
  • साँची-सारनाथ के लघु-स्तंभ लेख में अशोक धर्म महामात्रों को संघ-भेद रोकने का आदेश देता है।

अशोक के गुहा लेख (Cave-inscriptions)

  • अशोक ने बिहार राज्य के गया जिले (अब जहानाबाद) में बराबर व नागार्जुनी चट्टानों को काटवाकर तीसरी शताब्दी ई.पू. में शैलकृत गुफाओं का निर्माण करवाया था।
  • बराबर स्थित चार में से तीन गुफाओं में अशोक के शिलालेख हैं। इस शिलालेख से यह ज्ञात | होता है कि दो गुफाएँ अशोक द्वारा शासन के 12वें वर्ष और 19वें वर्ष भिक्षुओं को दी गयी।
  • इन गुफाओं को अशोक ने आजीवक सम्प्रदाय के भिक्षुओं के निवास के लिए बनवाया था।
  • अशोक की प्रमुख गुफाएँ हैं- कर्ण, चोपार, विश्व झोपड़ी और सुदामा।
  • कोशांबी अभिलेख को रानी का अभिलेख कहा जाता है।
  • अशोक का सबसे छोटा स्तंभ-लेख रूम्मिनदेई का है। इसी में लुम्बिनी में धम्म यात्रा के दौरान अशोक द्वारा भू-राजस्व की दर घटा देने की घोषणा की गयी है।
  • अशोक का 7वाँ अभिलेख सबसे लंबा है।
  • धौली एवं जौगड़ के लेखों को पृथक कलिंग प्रज्ञापन कहा गया है। इस अभिलेख में कलिंग राज्य के प्रति अशोक की शासन नीति के विषय में बताया गया है।
  • प्रथम पृथक् कलिंग शिलालेख में अशोक ने प्रजा के प्रति मौर्य कालीन प्रांत पितृ-तुल्य भाव प्रकट किया है।
  • अशोक का शार-ए-कुना (कंधार) अभिलेख ग्रीक एवं आरामाइक भाषाओं में प्राप्त हुआ है।
  • साम्राज्य में मुख्यमन्त्री एवं पुरोहित की नियुक्ति के पूर्व उनके चरित्र को काफी जाँचा परखा जाता था, जिसे उपधा परीक्षण कहा जाता था।
  • सम्राट की सहायता के लिए एक मन्त्रिपरिषद् होती थी, जिसमें सदस्यों की संख्या 1216 या 20 हआ करती थी।इन सदस्यों का वेतन 12,000 पण वार्षिक था।
  • मन्त्रिपरिषद् का राजा पर पूर्ण नियन्त्रण था पर मन्त्रिपरिषद्  
  • अर्थशास्त्र में ऊँचे स्तर (शीर्षस्थ) के अधिकारी के रूप में तीर्थ का उल्लेख मिलता है, इन्हें महामात्र भी कहा जाता था। इनकी संख्या 18 थी।

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