भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन MCQ प्रश्न उत्तर
(UPSC/IAS, IPS, PSC, Vyapam, Bank, Railway, RI, SSC एवं अन्य सभी प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए उपयोगी )
European trading companies in India
विदेशी कंपनी लिस्ट
कंपनी स्थापना वर्ष
एस्तादो द इंडिया (पुर्तगाली कंपनी) 1948
वेरिगिंदे ओस्त ईदिशे कंपनी (डच ईस्ट इंडिया कंपनी) 1602
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी 1600 (1599)
डेन ईस्ट इंडिया कंपनी 1616
कंपनी दास ईनदेश ओरिएंटल (फ्रांसीसी कंपनी) 1664
भारत में यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के आगमन से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
मध्यकाल में भारत और यूरोप के व्यापारिक सम्बन्ध थे। ये व्यापार मुख्यत: भारत के पश्चिमी समुद्र तट से लाल सागर और पश्चिमी एशिया के माध्यम से होता था।
यह व्यापार मसालों और विलासता की वस्तुओं से जुड़ा था। मसालों की आवश्यकता यूरोप में ठंडे के दिनों में मांस को सुरक्षित रखने और उसकी उपयोगिता को बढ़ाने के लिए होती थी।
पुर्तगीज राजकुमार हेनरी द नेविगेटर ने लंबी समुद्री यात्राओं को संभव बनाने के लिए दिक्सूचक यन्त्र तथा नक्षत्र यन्त्र के द्वारा गणनाएँ करने वाली तालिकाएँ और सारणियों का निर्माण कराया, जिससे समुद्र की लंबी यात्राएँ संभव हुई।
1486 ई. में पुर्तगाली नाविक बार्थोलेम्यूडिआज ने उत्तमाशा अंतरीप (Cape of Good Hope) तथा 1498 में वास्कोडिगामा ने भारत की खोज की।
भारत में यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के आगमन का क्रम इस प्रकार था- पुर्तगाली डच-अंग्रेज-डेन-फ्रांसीसी।
पुर्तगाली
प्रथम पुर्तगाली तथा प्रथम यूरोपीय यात्री वास्कोडिगामा नौ दिन की समुद्री यात्रा के बाद अब्दुल मनीक नामक गुजराती पथ प्रदर्शक की सहायता से 1498 ई. में कालीकट (भारत) के समुद्र तट पर उतरा।
कालीकट के शासक जमोरिन ने वास्कोडिगामा का स्वागत किया, लेकिन कालीकट के समुद्र तटों पर पहले से ही व्यापार कर रहे अरबों ने इसका विरोध किया।
वास्कोडिगामा ने भारत में कालीमिर्च के व्यापार से 60 गुना अधिक मुनाफा कमाया, जिससे अन्य पुर्तगीज व्यापारियों को भी प्रोत्साहन मिला।
पुर्तगालियों के दो उद्देश्य थे- अरबों और वेनिश के व्यापारियों का भारत से प्रभाव समाप्त करना तथा ईसाई धर्म का प्रचार करना। पुर्तगाली सामुद्रिक साम्राज्य को एस्तादो द इण्डिया नाम दिया गया।
वास्कोडिगामा के बाद भारत आने वाला दूसरा पुर्तगाली यात्री पेडो अल्ब्रेज कैब्राल (1500 ई.) था।
1502 ई. में वास्कोडिगामा दूसरी बार भारत आया। ३ पुर्तगाली व्यापारियों ने भारत में कालीकट, गोवा, दमन, दीव एवं हुगली के बंदरगाहों में अपनी व्यापारिक कोठियाँ (फैक्ट्रियाँ) स्थापित की।
भारत में प्रथम पुर्तगाली वायसराय के रूप में फ्रांसिस्को-डी-अल्मेडा (1505-1509 ई.) का आगमन हुआ। इसने सामुदिक नीति को अधिक महत्त्व दिया।
पूर्वी जगत् के कालीमिर्च और मसालों के व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त करने के उद्देश्य से पुर्तगालियों ने 1503 ई. में कोचीन में अपने पहली व्यापारिक कोठी की स्थापना की।
अल्मेडा के बाद अल्फांसो डी अल्बुकर्क 1509 ई. में पुर्तगालियों का वायसराय बनकर भारत आया। उसने 1510 ई. में बीजापुरी शासक यूसुफ आदिल शाह से गोवा को छीनकर अपने अधिकार में कर लिया।
अल्फांसो डी अल्बुकर्क ने भारत में पुर्तगालियों की आबादी बढ़ाने के उद्देश्य से भारतीय स्त्रियों से विवाह को प्रोत्साहन दिया।
गोवा को पुर्तगालियों ने अपनी सत्ता और संस्कृति के महत्त्वपूर्ण केन्द्र के रूप में स्थापित किया।
अल्फांसों डी अल्बुकर्क को भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
अल्फोसों डी अलबुकर्क ने अपनी सेना में भारतीयों की भी भर्ती की।
भारत आये पुर्तगाली वायसराय नीनू डी कुन्हा (1529-1538 ई.) ने 1530 ई. में कोचीन की जगह गोवा को राजधानी बनाया।
नीनू डी कुन्हा ने सैनथोमा (मद्रास), हुगली (बंगाल) और दीव (काठियावाड़) में पुर्तगीज बस्तियों की स्थापना की।
पुर्तगालियों ने काफिला पद्धति के तहत छोटे स्थानीय व्यापारियों के जहाजों को समुद्री यात्रा के समय संरक्षण प्रदान किया। इसके लिए जहाहों को चुंगी देनी होती थी।
पुर्तगाली गवर्नर अल्फांसो डिसूजा (1542-1545 ई.) के साथ प्रसिद्ध जेसुइट संत फ्रांसिस्को जेवियर भारत आया। २३ पुर्तगालियों के भारत आगमन से भारत में तंबाकू की खेती, जहाज निर्माण (गुजरात और कालीकट) तथा प्रिटिंग प्रेस की शुरुआत हुई।
1556 ई. में गोवा में पुर्तगालियों ने भारत का प्रथम प्रिंटिंग प्रेस स्थापित किया। भारतीय जड़ी-बूटियों और औषधीय वनस्पतियों पर यूरोपीय लेखक द्वारा लिखित पहले वैज्ञानिक ग्रन्थ का 1563 ई. में गोवा से प्रकाशन हुआ।
ईसाई धर्म का मुगल शासक अकबर के दरबार में प्रवेश फादर एकाबिवा और मांसरेत के नेतृत्व में हुआ।
पुर्तगालियों के साथ भारत में गोथिक स्थापत्य कला का आगमन हुआ।
पुर्तगाली गोवा, दमन और दीव पर 1961 तक शासन करते रहे। इस प्रकार वे सबसे पहले (1498) आये और सबसे अंत (1961) में वापस गये।
भारत में पुर्तगालियों ने सबसे पहले प्रवेश किया लेकिन 18वीं सदी तक आते-आते भारतीय व्यापार के क्षेत्र में उनका प्रभाव जाता रहा।
ड्च
डच लोग हालैण्ड के निवासी थे। हालैण्ड को वर्तमान में नीदरलैण्ड के नाम से जाना जाता है।
भारत डच ईस्ट इंडिया कंमनी (Vereenigde 00st-Indische Compagnie-VOC) की स्थापना 1602 ई. में की गयी।
भारत में आने वाला प्रथम डच नागरिक कारनेलिस डेहस्तमान था। वह 1596 में भारत आया था।
डचों का पुर्तगालियों से संघर्ष हुआ और धीरे-धीर डचों ने भारत के सभी महत्त्वपूर्ण मसाला उत्पादन के क्षेत्रों पर कब्जा कर पुर्तगालियों की शक्ति को कमजोर कर दिया।
1605 ई. में डचों ने पुर्तगालियों से अंवायना ले लिया तथा धीरे-धीरे मसाला द्वीप पुंज (इंडोनेशिया) में उन्हीं को हराकर अपना प्रभुत्व स्थापित किया।
डच ईस्ट इंडिया कंपनी की भारत से अधिक रुचि इंडोनेशिया के साथ मसाला व्यापार में थी।
भारत में डच फैक्ट्रियों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि पुलीकट स्थित गेल्ड्रिया के दुर्ग के अलावा सभी डच बस्तियों में कोई किलेबंदी नहीं थी।
डचों ने 1613 ई. में जकार्ता को जीतकर बैटविया नामक नये नगर की स्थापना की।
डचों ने 1641 ई. में मलक्का और 1658 ई. में सिलोन पर कब्जा कर लिया।
डचों ने 1605 ई. में मुसलीपट्टनम् में प्रथम डच कारखाना की स्थापना की।
डचों द्वारा भारत में स्थापित कुछ कारखाने- पुलीकट-1610 ई., सूरत-1616 ई., विमलीपट्टम-1641 ई., करिकाल-1645 ई., चिनसुरा-1653 ई., कोचीन-1663 ई. कासिम बाजार, पटना, बालासोर, नागपट्टम-1658 ई.।
डचों द्वारा भारत से नील, शोरा और सूती वस्त्र का निर्यात किया जाता था।
डच लोग मुसलीपट्टम से नील का निर्यात करते थे। मुख्यत: डच लोग भारत से सूती वस्त्र | का व्यापार करते थे।
बंगाल में प्रथम डच फैक्ट्री पीपली में स्थापित की गयी लेकिन शीघ्र ही पीपली की जगह बालासोर में फैक्ट्री की स्थापना की गयी।
1653 ई. में चिनसुरा अधिक शक्तिशाली डच व्यापार केन्द्र बन गया। यहाँ पर डचों ने गुस्तावुल नाम के किले का निर्माण कराया।
बंगाल से डच मुख्यत: सूती वस्त्र, रेशम, शोरा और अफीम का निर्यात करते थे।
डचों द्वारा कोरोमण्डल तटवर्ती प्रदेशों से सूती वस्त्र का व्यापार किया जाता था। मालाबार के । तटवर्ती प्रदेश से डच मसालों का व्यापार करते थे।
डचों ने पुलीकट में अपने स्वर्ण निर्मित पैगोडा सिक्के का प्रचलन करवाया। स्थापना वर्ष
डचों ने भारत में पुर्तगालियों को समुद्री व्यापार से एक तरह से निष्कासित कर दिया, लेकिन अंग्रेजों के नौसैनिक शक्ति टिक सके।
अंग्रेजी
उन यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों में जिन्होंने भारत में आकर अपनी व्यापारिक गतिविधियाँ आरंभ की उनमें अंग्रेज सर्वाधिक सफल रहे।
अंग्रेजों की सफलता का कारण था इनका भारत सहित समूचे एशियाई व्यापार के स्वरूप को समझना तथा व्यापार विस्तार में राजनैतिक सैनिक शक्ति का सहारा लेना।
1599 ई. में इंग्लैण्ड के मर्चेट एडवेंचर्स नामक दल ने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी अथवा दि गवर्नर एण्ड कंपनी ऑफ मर्चेट्स ऑफ ट्रेडिंग इन टू द ईस्ट इंडीज की स्थापना की।
दिसंबर, 1600 ई. में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ टेलर प्रथम ने ईस्ट इंडिया कंपनी को पूर्व के साथ 15 वर्षों के लिए अधिकार पत्र प्रदान किया।
प्रारम्भ में ईस्ट इंडिया कंपनी में 217 साझीदार थे और पहला गवर्नर टॉमस स्मिथ था।
1608 ई. में इंग्लैण्ड के राजा जेम्स प्रथम के दूत के रूप में कैप्टन हॉकिन्स सूरत पहुँचा, जहाँ से वह मुगल सम्राट जहाँगीर से मिलने आगरा गया।
हॉकिन्स फारसी भाषा का बहुत अच्छा ज्ञाता था, जहाँगीर उससे बहुत अधिक प्रभावित था।
जहाँगीर हॉकिन्स के व्यवहार से प्रसन्न होकर उसे आगरा में बसने तथा 400 की मनसब एवं जागीर प्रदान की।
1609 ई. में हॉकिन्स ने जहाँगीर से मिलकर सूरत में बसने की इजाजत माँगी परन्तु पुर्तगालियों के विद्रोह तथा सूरत के सौदागरों के विद्रोह के काण उसे स्वीकृति नहीं मिली।
सर टॉमस रो ब्रिटेन के सम्राट जेम्स प्रथम के दूत के रूप में 18 सितंबर, 1615 ई. को सूरत पहुँचा, 10 जनवरी, 1616 ई. को रो अजमेर में जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ।
रो मुगल दरबार में 10 जनवरी, 1616 ई. से 17 फरवरी, 1618 ई. तक रहा। इसी बीच रो ने मुगल दरबार से साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों में व्यापार करने तथा व्यापारिक कोठियाँ खोलने की अनुमति प्राप्त कर ली।
1619 ई. तक अहमदाबाद, भड़ौच, बड़ौदा व आगरा में कंपनी के व्यापारिक कारखाने स्थापित हो गये। सभी व्यापारिक कोठियों का इस समय नियन्त्रण सूरत से होता था।
दक्षिण भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का पहला कारखाना 1611 ई. में मुसलीपट्टम और पेटापुली में स्थापित हुआ। यहाँ से स्थानीय बुनकरों द्वारा निर्मित वस्त्रों को कंपनी खरीद कर फारस और बंतम को निर्यात करती थी।
1632 ई. में अंग्रेजों ने गोलकुण्डा के सुल्तान से एक सुनहरा फरमान प्राप्त कर 500 पैगोडा वार्षिक कर अदा करने के बदले गोलकुण्डा राज्य में स्थित बंदरगाहों से व्यापार करने का एकाधिकार प्राप्त कर लिया।
1633 ई. में पूर्वी तट पर अंग्रेजों ने अपना पहला कारखाना बालासोर और हरिहरपुरा में स्थापित किया था।
1639 ई. में फ्रांसिस डे नामक अंग्रेज को चन्द्रगिरी के राजा से मद्रास पट्टे पर प्राप्त हो गया। यहीं पर अंग्रेजों ने फोर्ट सेंट जार्ज नामक किले की स्थापना की थी।
1641 ई. में कोरोमण्डल तट पर फोर्ट सेंट जार्ज कंपनी का मुख्यालय बन गया।
1661 ई. में इंग्लैण्ड के सम्राट चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तगाल की राजकुमारी कैथरीन बेगांजा से होने के कारण चार्ल्स को बम्बई दहेज के रूप में प्राप्त हुआ था जिसे उन्होंने दस पौण्ड वार्षिक किराए पर ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दिया। ३ 1669 से 1677 ई. तक बम्बई का गवर्नर गोराल्ड औंगियार ही वास्तव में बम्बई का संस्थापक था।
1687 ई. तक बम्बई पश्चिमी तट का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बन बया।
गेराल्ड औंगियार ने बम्बई में किलेबंदी के साथ ही वहाँ गोदी का निर्माण कराया तथा बम्बई नगर, एक न्यायालय और पुलिस दल की स्थापना की।
गेराल्ड औंगियार ने बम्बई के गवर्नर के रूप यहाँ ताँबे और चाँदी के सिक्के ढालने के लिए टकसाल की स्थापना की।
1651 ई. में तक बंगाल, बिहार, ओडिशा और कोरोमण्डल की समस्त अंग्रेज फैक्ट्रियाँ फोर्ट सेंट जार्ज (मद्रास) के अन्तर्गत आ गयी।
1633-1663 ई. के बीच अंग्रेज फैक्ट्रियों का उद्देश्य मुगल संरक्षण में शांतिपूर्वक व्यापार करना था, किंतु 1683-1685 ई. में अंग्रेज व्यापारी, स्थानीय शक्तियों के साथ विवादों, अन्य यूरोपियन कंपनियों के अधिकृत और अनाधिकृत व्यापारियों तथा आपसी झगड़े में व्यस्त हो गये।
17वीं शताब्दी के उत्तरिद्ध में अनेक कारणों से ईस्ट इंडिया कंपनी की नीति में परिवर्तन आया, अब वह सिर्फ व्यापारिक संस्था भर न रहकर भारतीय राजनीति में दिलचस्पी लेने लगी।
बंगाल में सुल्तान शाहशुजा ने 1651 ई. में एक फरमान निकाला, जिसमें कंपनी को 3000 रुपये वार्षिक कर के बदले व्यापार का विशेषाधिकार दे दिया गया। 1656 ई. में दूसरा निशान (फरमान) मंजूर किया। इसी प्रकार कंपनी ने 1672 ई. में शाइस्ता खाँ से तथा 1680 ई. में अंग्रेज से व्यापारिक रियायतों के सम्बन्ध में फरमान प्राप्त किया।
भारत में यूरोपीय कंपनियों का आगमन MCQ प्रश्न उत्तर
(UPSC/IAS, IPS, PSC, Vyapam, Bank, Railway, RI, SSC एवं अन्य सभी प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए उपयोगी )
European trading companies in India
विदेशी कंपनी लिस्ट
कंपनी स्थापना वर्ष
एस्तादो द इंडिया (पुर्तगाली कंपनी) 1948
वेरिगिंदे ओस्त ईदिशे कंपनी (डच ईस्ट इंडिया कंपनी) 1602
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी 1600 (1599)
डेन ईस्ट इंडिया कंपनी 1616
कंपनी दास ईनदेश ओरिएंटल (फ्रांसीसी कंपनी) 1664
भारत में यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के आगमन से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य
मध्यकाल में भारत और यूरोप के व्यापारिक सम्बन्ध थे। ये व्यापार मुख्यत: भारत के पश्चिमी समुद्र तट से लाल सागर और पश्चिमी एशिया के माध्यम से होता था।
यह व्यापार मसालों और विलासता की वस्तुओं से जुड़ा था। मसालों की आवश्यकता यूरोप में ठंडे के दिनों में मांस को सुरक्षित रखने और उसकी उपयोगिता को बढ़ाने के लिए होती थी।
पुर्तगीज राजकुमार हेनरी द नेविगेटर ने लंबी समुद्री यात्राओं को संभव बनाने के लिए दिक्सूचक यन्त्र तथा नक्षत्र यन्त्र के द्वारा गणनाएँ करने वाली तालिकाएँ और सारणियों का निर्माण कराया, जिससे समुद्र की लंबी यात्राएँ संभव हुई।
1486 ई. में पुर्तगाली नाविक बार्थोलेम्यूडिआज ने उत्तमाशा अंतरीप (Cape of Good Hope) तथा 1498 में वास्कोडिगामा ने भारत की खोज की।
भारत में यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों के आगमन का क्रम इस प्रकार था- पुर्तगाली डच-अंग्रेज-डेन-फ्रांसीसी।
पुर्तगाली
प्रथम पुर्तगाली तथा प्रथम यूरोपीय यात्री वास्कोडिगामा नौ दिन की समुद्री यात्रा के बाद अब्दुल मनीक नामक गुजराती पथ प्रदर्शक की सहायता से 1498 ई. में कालीकट (भारत) के समुद्र तट पर उतरा।
कालीकट के शासक जमोरिन ने वास्कोडिगामा का स्वागत किया, लेकिन कालीकट के समुद्र तटों पर पहले से ही व्यापार कर रहे अरबों ने इसका विरोध किया।
वास्कोडिगामा ने भारत में कालीमिर्च के व्यापार से 60 गुना अधिक मुनाफा कमाया, जिससे अन्य पुर्तगीज व्यापारियों को भी प्रोत्साहन मिला।
पुर्तगालियों के दो उद्देश्य थे- अरबों और वेनिश के व्यापारियों का भारत से प्रभाव समाप्त करना तथा ईसाई धर्म का प्रचार करना। पुर्तगाली सामुद्रिक साम्राज्य को एस्तादो द इण्डिया नाम दिया गया।
वास्कोडिगामा के बाद भारत आने वाला दूसरा पुर्तगाली यात्री पेडो अल्ब्रेज कैब्राल (1500 ई.) था।
1502 ई. में वास्कोडिगामा दूसरी बार भारत आया। ३ पुर्तगाली व्यापारियों ने भारत में कालीकट, गोवा, दमन, दीव एवं हुगली के बंदरगाहों में अपनी व्यापारिक कोठियाँ (फैक्ट्रियाँ) स्थापित की।
भारत में प्रथम पुर्तगाली वायसराय के रूप में फ्रांसिस्को-डी-अल्मेडा (1505-1509 ई.) का आगमन हुआ। इसने सामुदिक नीति को अधिक महत्त्व दिया।
पूर्वी जगत् के कालीमिर्च और मसालों के व्यापार पर एकाधिकार प्राप्त करने के उद्देश्य से पुर्तगालियों ने 1503 ई. में कोचीन में अपने पहली व्यापारिक कोठी की स्थापना की।
अल्मेडा के बाद अल्फांसो डी अल्बुकर्क 1509 ई. में पुर्तगालियों का वायसराय बनकर भारत आया। उसने 1510 ई. में बीजापुरी शासक यूसुफ आदिल शाह से गोवा को छीनकर अपने अधिकार में कर लिया।
अल्फांसो डी अल्बुकर्क ने भारत में पुर्तगालियों की आबादी बढ़ाने के उद्देश्य से भारतीय स्त्रियों से विवाह को प्रोत्साहन दिया।
गोवा को पुर्तगालियों ने अपनी सत्ता और संस्कृति के महत्त्वपूर्ण केन्द्र के रूप में स्थापित किया।
अल्फांसों डी अल्बुकर्क को भारत में पुर्तगाली साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक माना जाता है।
अल्फोसों डी अलबुकर्क ने अपनी सेना में भारतीयों की भी भर्ती की।
भारत आये पुर्तगाली वायसराय नीनू डी कुन्हा (1529-1538 ई.) ने 1530 ई. में कोचीन की जगह गोवा को राजधानी बनाया।
नीनू डी कुन्हा ने सैनथोमा (मद्रास), हुगली (बंगाल) और दीव (काठियावाड़) में पुर्तगीज बस्तियों की स्थापना की।
पुर्तगालियों ने काफिला पद्धति के तहत छोटे स्थानीय व्यापारियों के जहाजों को समुद्री यात्रा के समय संरक्षण प्रदान किया। इसके लिए जहाहों को चुंगी देनी होती थी।
पुर्तगाली गवर्नर अल्फांसो डिसूजा (1542-1545 ई.) के साथ प्रसिद्ध जेसुइट संत फ्रांसिस्को जेवियर भारत आया। २३ पुर्तगालियों के भारत आगमन से भारत में तंबाकू की खेती, जहाज निर्माण (गुजरात और कालीकट) तथा प्रिटिंग प्रेस की शुरुआत हुई।
1556 ई. में गोवा में पुर्तगालियों ने भारत का प्रथम प्रिंटिंग प्रेस स्थापित किया। भारतीय जड़ी-बूटियों और औषधीय वनस्पतियों पर यूरोपीय लेखक द्वारा लिखित पहले वैज्ञानिक ग्रन्थ का 1563 ई. में गोवा से प्रकाशन हुआ।
ईसाई धर्म का मुगल शासक अकबर के दरबार में प्रवेश फादर एकाबिवा और मांसरेत के नेतृत्व में हुआ।
पुर्तगालियों के साथ भारत में गोथिक स्थापत्य कला का आगमन हुआ।
पुर्तगाली गोवा, दमन और दीव पर 1961 तक शासन करते रहे। इस प्रकार वे सबसे पहले (1498) आये और सबसे अंत (1961) में वापस गये।
भारत में पुर्तगालियों ने सबसे पहले प्रवेश किया लेकिन 18वीं सदी तक आते-आते भारतीय व्यापार के क्षेत्र में उनका प्रभाव जाता रहा।
ड्च
डच लोग हालैण्ड के निवासी थे। हालैण्ड को वर्तमान में नीदरलैण्ड के नाम से जाना जाता है।
भारत डच ईस्ट इंडिया कंमनी (Vereenigde 00st-Indische Compagnie-VOC) की स्थापना 1602 ई. में की गयी।
भारत में आने वाला प्रथम डच नागरिक कारनेलिस डेहस्तमान था। वह 1596 में भारत आया था।
डचों का पुर्तगालियों से संघर्ष हुआ और धीरे-धीर डचों ने भारत के सभी महत्त्वपूर्ण मसाला उत्पादन के क्षेत्रों पर कब्जा कर पुर्तगालियों की शक्ति को कमजोर कर दिया।
1605 ई. में डचों ने पुर्तगालियों से अंवायना ले लिया तथा धीरे-धीरे मसाला द्वीप पुंज (इंडोनेशिया) में उन्हीं को हराकर अपना प्रभुत्व स्थापित किया।
डच ईस्ट इंडिया कंपनी की भारत से अधिक रुचि इंडोनेशिया के साथ मसाला व्यापार में थी।
भारत में डच फैक्ट्रियों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि पुलीकट स्थित गेल्ड्रिया के दुर्ग के अलावा सभी डच बस्तियों में कोई किलेबंदी नहीं थी।
डचों ने 1613 ई. में जकार्ता को जीतकर बैटविया नामक नये नगर की स्थापना की।
डचों ने 1641 ई. में मलक्का और 1658 ई. में सिलोन पर कब्जा कर लिया।
डचों ने 1605 ई. में मुसलीपट्टनम् में प्रथम डच कारखाना की स्थापना की।
डचों द्वारा भारत में स्थापित कुछ कारखाने- पुलीकट-1610 ई., सूरत-1616 ई., विमलीपट्टम-1641 ई., करिकाल-1645 ई., चिनसुरा-1653 ई., कोचीन-1663 ई. कासिम बाजार, पटना, बालासोर, नागपट्टम-1658 ई.।
डचों द्वारा भारत से नील, शोरा और सूती वस्त्र का निर्यात किया जाता था।
डच लोग मुसलीपट्टम से नील का निर्यात करते थे। मुख्यत: डच लोग भारत से सूती वस्त्र | का व्यापार करते थे।
बंगाल में प्रथम डच फैक्ट्री पीपली में स्थापित की गयी लेकिन शीघ्र ही पीपली की जगह बालासोर में फैक्ट्री की स्थापना की गयी।
1653 ई. में चिनसुरा अधिक शक्तिशाली डच व्यापार केन्द्र बन गया। यहाँ पर डचों ने गुस्तावुल नाम के किले का निर्माण कराया।
बंगाल से डच मुख्यत: सूती वस्त्र, रेशम, शोरा और अफीम का निर्यात करते थे।
डचों द्वारा कोरोमण्डल तटवर्ती प्रदेशों से सूती वस्त्र का व्यापार किया जाता था। मालाबार के । तटवर्ती प्रदेश से डच मसालों का व्यापार करते थे।
डचों ने पुलीकट में अपने स्वर्ण निर्मित पैगोडा सिक्के का प्रचलन करवाया। स्थापना वर्ष
डचों ने भारत में पुर्तगालियों को समुद्री व्यापार से एक तरह से निष्कासित कर दिया, लेकिन अंग्रेजों के नौसैनिक शक्ति टिक सके।
अंग्रेजी
उन यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों में जिन्होंने भारत में आकर अपनी व्यापारिक गतिविधियाँ आरंभ की उनमें अंग्रेज सर्वाधिक सफल रहे।
अंग्रेजों की सफलता का कारण था इनका भारत सहित समूचे एशियाई व्यापार के स्वरूप को समझना तथा व्यापार विस्तार में राजनैतिक सैनिक शक्ति का सहारा लेना।
1599 ई. में इंग्लैण्ड के मर्चेट एडवेंचर्स नामक दल ने अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी अथवा दि गवर्नर एण्ड कंपनी ऑफ मर्चेट्स ऑफ ट्रेडिंग इन टू द ईस्ट इंडीज की स्थापना की।
दिसंबर, 1600 ई. में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ टेलर प्रथम ने ईस्ट इंडिया कंपनी को पूर्व के साथ 15 वर्षों के लिए अधिकार पत्र प्रदान किया।
प्रारम्भ में ईस्ट इंडिया कंपनी में 217 साझीदार थे और पहला गवर्नर टॉमस स्मिथ था।
1608 ई. में इंग्लैण्ड के राजा जेम्स प्रथम के दूत के रूप में कैप्टन हॉकिन्स सूरत पहुँचा, जहाँ से वह मुगल सम्राट जहाँगीर से मिलने आगरा गया।
हॉकिन्स फारसी भाषा का बहुत अच्छा ज्ञाता था, जहाँगीर उससे बहुत अधिक प्रभावित था।
जहाँगीर हॉकिन्स के व्यवहार से प्रसन्न होकर उसे आगरा में बसने तथा 400 की मनसब एवं जागीर प्रदान की।
1609 ई. में हॉकिन्स ने जहाँगीर से मिलकर सूरत में बसने की इजाजत माँगी परन्तु पुर्तगालियों के विद्रोह तथा सूरत के सौदागरों के विद्रोह के काण उसे स्वीकृति नहीं मिली।
सर टॉमस रो ब्रिटेन के सम्राट जेम्स प्रथम के दूत के रूप में 18 सितंबर, 1615 ई. को सूरत पहुँचा, 10 जनवरी, 1616 ई. को रो अजमेर में जहाँगीर के दरबार में उपस्थित हुआ।
रो मुगल दरबार में 10 जनवरी, 1616 ई. से 17 फरवरी, 1618 ई. तक रहा। इसी बीच रो ने मुगल दरबार से साम्राज्य के विभिन्न हिस्सों में व्यापार करने तथा व्यापारिक कोठियाँ खोलने की अनुमति प्राप्त कर ली।
1619 ई. तक अहमदाबाद, भड़ौच, बड़ौदा व आगरा में कंपनी के व्यापारिक कारखाने स्थापित हो गये। सभी व्यापारिक कोठियों का इस समय नियन्त्रण सूरत से होता था।
दक्षिण भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का पहला कारखाना 1611 ई. में मुसलीपट्टम और पेटापुली में स्थापित हुआ। यहाँ से स्थानीय बुनकरों द्वारा निर्मित वस्त्रों को कंपनी खरीद कर फारस और बंतम को निर्यात करती थी।
1632 ई. में अंग्रेजों ने गोलकुण्डा के सुल्तान से एक सुनहरा फरमान प्राप्त कर 500 पैगोडा वार्षिक कर अदा करने के बदले गोलकुण्डा राज्य में स्थित बंदरगाहों से व्यापार करने का एकाधिकार प्राप्त कर लिया।
1633 ई. में पूर्वी तट पर अंग्रेजों ने अपना पहला कारखाना बालासोर और हरिहरपुरा में स्थापित किया था।
1639 ई. में फ्रांसिस डे नामक अंग्रेज को चन्द्रगिरी के राजा से मद्रास पट्टे पर प्राप्त हो गया। यहीं पर अंग्रेजों ने फोर्ट सेंट जार्ज नामक किले की स्थापना की थी।
1641 ई. में कोरोमण्डल तट पर फोर्ट सेंट जार्ज कंपनी का मुख्यालय बन गया।
1661 ई. में इंग्लैण्ड के सम्राट चार्ल्स द्वितीय का विवाह पुर्तगाल की राजकुमारी कैथरीन बेगांजा से होने के कारण चार्ल्स को बम्बई दहेज के रूप में प्राप्त हुआ था जिसे उन्होंने दस पौण्ड वार्षिक किराए पर ईस्ट इंडिया कंपनी को दे दिया। ३ 1669 से 1677 ई. तक बम्बई का गवर्नर गोराल्ड औंगियार ही वास्तव में बम्बई का संस्थापक था।
1687 ई. तक बम्बई पश्चिमी तट का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र बन बया।
गेराल्ड औंगियार ने बम्बई में किलेबंदी के साथ ही वहाँ गोदी का निर्माण कराया तथा बम्बई नगर, एक न्यायालय और पुलिस दल की स्थापना की।
गेराल्ड औंगियार ने बम्बई के गवर्नर के रूप यहाँ ताँबे और चाँदी के सिक्के ढालने के लिए टकसाल की स्थापना की।
1651 ई. में तक बंगाल, बिहार, ओडिशा और कोरोमण्डल की समस्त अंग्रेज फैक्ट्रियाँ फोर्ट सेंट जार्ज (मद्रास) के अन्तर्गत आ गयी।
1633-1663 ई. के बीच अंग्रेज फैक्ट्रियों का उद्देश्य मुगल संरक्षण में शांतिपूर्वक व्यापार करना था, किंतु 1683-1685 ई. में अंग्रेज व्यापारी, स्थानीय शक्तियों के साथ विवादों, अन्य यूरोपियन कंपनियों के अधिकृत और अनाधिकृत व्यापारियों तथा आपसी झगड़े में व्यस्त हो गये।
17वीं शताब्दी के उत्तरिद्ध में अनेक कारणों से ईस्ट इंडिया कंपनी की नीति में परिवर्तन आया, अब वह सिर्फ व्यापारिक संस्था भर न रहकर भारतीय राजनीति में दिलचस्पी लेने लगी।
बंगाल में सुल्तान शाहशुजा ने 1651 ई. में एक फरमान निकाला, जिसमें कंपनी को 3000 रुपये वार्षिक कर के बदले व्यापार का विशेषाधिकार दे दिया गया। 1656 ई. में दूसरा निशान (फरमान) मंजूर किया। इसी प्रकार कंपनी ने 1672 ई. में शाइस्ता खाँ से तथा 1680 ई. में अंग्रेज से व्यापारिक रियायतों के सम्बन्ध में फरमान प्राप्त किया।
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