head छत्तीसगढ़ में जनजातीय विद्रोह | CG Adivasi Aandolan

छत्तीसगढ़ में जनजातीय विद्रोह | CG Adivasi Aandolan

Chhattisgarh Adivasi Aandolan GK

छत्तीसगढ़ के संदर्भ में जनजातीय/आदिवासी आंदोलन का अर्थ है बस्तर के आदिवासियों का आंदोलन क्योंकि बस्तर आदिवासी बहुल अंचल है और प्रायः सभी आदिवासी आंदोलन इसी अंचल में हुए हैं। बस्तर के आदिवासियों द्वारा जो विद्रोह आंदोलन किए गए, उनका विवरण इस प्रकार है

chhattisgarh ke janjati vidroh

हल्बा विद्रोह : 1774-78

  • : छत्तीसगढ़ का प्रथम आदिवासी विद्रोह
  • : दरियादेव द्वारा मराठों व अंग्रेजों से संधि
  • अजमेर सिंह को पराजित करते हुए शासक बना 
  • बस्तर में चालुक्य शासन का अंत
  • बस्तर में मराठा शासन प्रारंभ (कोटपाड़ की संधि 1778)

1. हल्बा विद्रोह : 1774-79 ई०

हल्बा विद्रोह डोंगर क्षेत्र में हुआ। चालुक्य शासक उसे रोकने में असफल रहे और उनका पतन हो गया। वे कंपनी सरकार के षड्यंत्र के कारण मराठों के अधीन हो गए। – डोंगर कभी हल्बाओं का स्वतंत्र राज्य था जो बाद में बस्तर रियासत में शामिल कर लिया गया। उसके बाद बस्तर का राजा उसे उपराजधानी बनाकर अपने पुत्रों को वहां का गवर्नर नियुक्त करने लगा। बस्तर के राजा दलपत सिंह ने अपने पुत्र अजमेर सिंह को डोंगर का गवर्नर नियुक्त किया। वर्ष 1774 ई० में जब दरियावदेव बस्तर का नया राजा बना तो उसने डोंगर क्षेत्र की घोर उपेक्षा की तथा शत्रुतावश अजमेर सिंह पर दबाव डालने लगा। इसी वर्ष डोंगर क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ा और वहां अराजकता फैल गई। इसी समय दरियावदेव ने डोंगर पर आक्रमण कर दिया। इस समय डोंगर यो। की सुरक्षा के लिए कांकेर की सेना तैनात थी। दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ। दरियावदेव पराजित हो राजधानी जगदलपुर भाग गया।
विद्रोहियों की स्थिति मजबूत हो गई थी। उन्होंने बस्तर को हथियाने की योजना बनाई। वे ऐसा करके कंपनी सरकार की जगदलपुर में दखलंदाजी को रोकना चाहते थे। विद्रोही आगे बढ़ते गए और दरियावदेवकी सेना पराजित होती गयी। दरियावदेव भागकर जैपुर राज्य चला गया।
जैपुर में रहकर दरियावदेव ने अपनी खोई हुई शक्ति को फिर से पाने का प्रयास करने लगा। दरियावदेव ने कंपनी सरकार, मराठों और जैपुर के राजा के साथ अलगअलग संधि कर 20,000 सैनिकों की एक बड़ी सेना तैयार की। इस सेना की सहायता से उसने जगदलपुर में विद्रोहियों को पराजित किया। जगदलपुर में अपना अधिकार स्थापित कर दरियावदेव ने डोंगर पर आक्रमण किया। युद्ध में अजमेर सिंह मारा गया। बड़े पैमाने पर हल्बा विद्रोहियों की हत्या कर दी गई।
इस प्रकार, हल्बा विद्रोह का अंत हुआ। पर इसके कारण जगदलपुर के राजा की स्थिति बड़ी कमजोर हो गई। बस्तर मराठा भोंसलाओं के अधीन हो गया और भविष्य में वहाँ अंग्रेजों के आगमन का मार्ग प्रशस्त हो गया। विद्रोह की समाप्ति के बाद बस्तर के राजा दरियावदेव ने 6 अप्रैल, 1778 ई० को एक संधि-पत्र पर हस्ताक्षर किया, जिसके अनुसार उसे भोंसलों की अधीनता स्वीकार करनी पड़ी। जैपुर के राजा को सहायता के बदले पुरस्कारस्वरूप कोटपाड़ परगना देना पड़ा।

2. भोपालपट्टनम संघर्ष : 1795 ई०

यह संघर्ष सीमित और अल्पकालीन था। वर्ष 1795 ई० में जब ब्रिटिश यात्री कैप्टन जे० टी० ब्लण्ट बस्तर की सीमा पर पहुंचा तब आदिवासियों ने उसके जगदलपुर प्रवेश का विरोध करते हुए इजाजत नहीं दी। फलस्वरूप ब्लण्ट को विवश होकर कलकत्ता लौटना पड़ा।

3. परलकोट विद्रोह : 1825 ई०

परलकोट जमींदारी क्षेत्र में मराठों एवं ब्रिटिश अधिकारियों के विरुद्ध हुए अबूझमाड़ियों का विद्रोह ‘परलकोट विद्रोह’ के नाम से जाना जाता है। इस विद्रोह का नेतृत्व गेंदा सिंह ने किया। अबूझमाड़ विद्रोही बाण, कुल्हाड़ी आदि से लैस होते थे। वे नगाड़ा बजाकर साथियों को इकट्ठा कर मराठों और ब्रिटिश अधिकारियों पर हमला बोल देते थे। वे युद्ध का छापामार तरीका अपनाते थे।
इस आदिवासी क्षेत्र में गैर-आदिवासियों की उपस्थिति और मनमानी से वे परेशान थे। इसलिए गैर-आदिवासी उनके निशाने पर थे। ऐसी स्थिति में मराठों और अंग्रेजों की संयुक्त सेना ने 10 जनवरी, 1825 ई० को परलकोट को घेर लिया। विद्रोही नेता गेंदा सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें महल के सामने फांसी दे दी गई।
गेंदा सिंह की असफलता का सबसे बड़ा कारण अबूझमाड़ियों के पास परंपरागत हथियार होना तथा विरोधियों के पास आधुनिक हथियार का होना था।

4. तारापुर विद्रोह : 1842-54 ई०

मराठा शासन ने तारापुर परगने की टकोली में वृद्धि कर दी थी जिसका तारापुर के गवर्नर दलगंजन सिंह ने विरोध किया। आदिवासियों ने दलगंजन सिंह को आंग्ल-मराठा शासन के खिलाफ बगावत करने की सलाह दी।
विदेशी शासन के कारण तारापुर परगना के आदिवासी किसानों को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था। इस क्षेत्र से अवैधानिक करों की वसूली की जा रही थी। आदिवासियों पर कई प्रकार के करारोपण के लिए वे दीवान जगबंधु को जिम्मेदार मानते थे। इसलिए उन्होंने एक दिन मौका पाकर उसे पकड़ लिया और उसे अपने नेता दलगंजन सिंह के सामने पेश किया। बस्तर नरेश भूपाल देव, जोकि गवर्नर दलगंजन सिंह का भाई था, के अनुरोध पर आदिवासियों के विरोध के बावजूद दलगंजन सिंह ने दीवान को छोड़ दिया।
रिहा होने के बाद दीवान जगबन्धु ने नागपुर जाकर वहाँ के अधिकारियों से इस विद्रोह को कुचलने का आग्रह किया। तदनुरूप नागपुर की सेना ने बस्तर की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने तारापुर के आदिवासियों के विरुद्ध युद्ध किया। विद्रोही सेना हार गयी। दलगंजन सिंह को आत्मसमर्पण करना पड़ा।
आदिवासियों की विद्रोह भावना को शांत करने के लिए बाद में दीवान को हटा दिया गया और उसके द्वारा आदिवासी रैयतों पर लगाए गए सभी कर हटा लिये गये। इससे आदिवासी शांत हो गए। दलगंजन सिंह को नागपुर ले जाया गया। उन्हें 6 महीने की जेल की सजा दी गई।

5. मेरिया विद्रोह : 1842-63 ई०

दन्तेवाड़ा के मेरिया आदिवासियों द्वारा आंग्ल-मराठा शासन के खिलाफ उनकी परंपराओं पर होनेवाले आक्रमणों के विरुद्ध यह एक विद्रोह था। ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा स्थानीय परंपरा-मेरिया आदिवासियों द्वारा दन्तेवाड़ा मंदिर में बलि देने की प्रथा—में हस्तक्षेप के कारण यह विद्रोह हुआ।
ब्रिटिश सरकार ने नरबलि की प्रथा को समाप्त करने के लिए बस्तर नरेश को आदेश दिया। इसके बावजूद यह परंपरा जारी रही। तदनुसार नागपुर की एक सेना दन्तेवाड़ा के मंदिर में नरबलि को रोकने के उद्देश्य से तैनात की गई। इस घटना से नाराज होकर आदिवासियों ने विद्रोह कर दिया।
दन्तेवाड़ा क्षेत्र को निषिद्ध घोषित कर रायपुर के तत्कालीन तहसीलदार शेर खां को नरबलि को रोकने के लिए वहां भेजा गया। दन्तेवाड़ा मंदिर के तत्कालीन पुजारी श्याम सुन्दर जिया ने ब्रिटिश सरकार की इस कार्यवाही का विरोध किया और आदिवासियों को विद्रोह के लिए उकसाया।
हिड़मा मांझी के नेतृत्व में मेरिया विद्रोहियों ने दन्तेवाड़ा से सैनिकों को हटा लेने की मांग की। उनकी बात अनसुनी कर दी गई और उल्टे मुसलमान सैनिकों ने मेरिया लोगों पर जुल्म करना शुरू कर दिया। इसके कारण विद्रोहियों ने छिप-छिपकर आक्रमण करना आरंभ कर दिया।
ऐसी स्थिति में अतिरिक्त सेना बुलायी गई और उसकी सहायता से विद्रोह को पूरी तरह से कुचल दिया गया। 6. लिंगागिरि विद्रोह : 1856-57 ई० वर्ष 1854 ई० में छत्तीसगढ़ में ब्रिटिश शासन स्थापित हुआ। अंग्रेज अधिकारियों की शोषण व दमन नीति से तंग आकर भोपालपट्टनम जमींदारी क्षेत्र के लिंगागिरि तालुका के तालुकेदार धुर्वा राव ने अंग्रेजों के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह किया।
3 मार्च, 1856 ई० को चिन्तलवार में अंग्रेजों और धुर्वा राव के सैनिकों के बीच युद्ध हुआ। युद्ध में अंग्रेजों की ओर से लडते हए भोपालपट्टनम का जमींदार घायल हो गया। धुर्वा राव अंग्रेजों द्वारा पकड़ा गया और 5 मार्च, 1856 ई० को उसे फाँसी पर लटका दिया गया। धुर्वा राव का तालुका भोपालपट्टनम के जमींदार को दे दिया गया क्योंकि उसने अंग्रेजों की सहायता

7. कोई विद्रोह : 1859 ई०

वर्ष 1859 ई० में दक्षिणी बस्तर के स्थानीय जमींदारों और कोई आदिवासियों में बिटिश अधिकारी एवं बाहरी ठेकेदार के विरुद्ध विद्रोह किया। जमींदारों एवं कोई
आदिवासियों के असंतोष का कारण यह था कि ब्रिटिश सरकार ने जंगलों को काटने का ठेका हैदराबाद के व्यापारियों को दे दिया था और ठेकेदार ब्रिटिश अधिकारियों से मिली-भगत कर मनमानी करते थे। जब ठेकेदार हरिदास भगवानदास के खिलाफ ब्रिटिश शासनाधिकारी से शिकायत की गई तो उसने कोई ध्यान नहीं दिया।
इस पर वर्ष 1859 ई० में भेजी, कोतापल्ली और फोतकेल के जमींदारों ने सामूहिक रूप से यह निर्णय लिया कि भविष्य में बस्तर में साल वृक्ष को कटने नहीं दिया जाएगा। ब्रिटिश सरकार ने इसे चुनौती के रूप में स्वीकारते हुए मजदूरों के साथ बंदूकधारी सिपाहियों को भेज दिया। इस सूचना को पाकर कोई आदिवासी भड़क उठे और वे मशाल लेकर अपने हथियारों के साथ जंगलों की ओर दौड़ पड़े और लकड़ी काटनेवालों पर हमला बोल दिया और ‘एक साल वृक्ष के पीछे एक व्यक्ति का सिर’ नारा बुलंद किया।
इस विद्रोह में अनेक ठेकेदार मारे गए। विद्रोह का नेतृत्व जुग्गा, जुम्मा, राजू, दोरा, पाम भोई आदि ने किया। अंत में अंग्रेजों को विवश होकर ठेकेदारी प्रथा समाप्त करना पड़ा।

8. मुरिया विद्रोह : 1876 ई०

वर्ष 1876 ई० में बस्तर के राजा विशेषकर उसके दीवान और मुंशी के अत्याचारों और अंग्रेजों की शोषणमूलक नीति के विरुद्ध मुरिया आदिवासियों ने जो विद्रोह किया उसे ‘मुरिया विद्रोह’ या ‘1876 का विद्रोह’ कहा जाता है।
ब्रिटिश सरकार ने भारत के अन्य देशी रियासतों के राजाओं की भाँति बस्तर के राजा भैरमदेव को प्रिंस आफ वेल्स के सम्मान में आयोजित दिल्ली दरबार में उपस्थित होने का आदेश दिया। ब्रिटिश आदेशानुसार जब बस्तर का राजा भैरमदेव दिल्ली जाते हुए मारेंगा नामक स्थान पर पहुँचा तो मुरिया आदिवासियों ने उन्हें दिल्ली न जाने की प्रार्थना की ।
मुरिया आदिवासियों को यह अंदेशा था कि राजा की अनुपस्थिति में दीवान गोपीनाथ और मुंशी आदिल प्रसाद के अत्याचार बढ़ जाएंगे। इसलिए मुरिया आदिवासियों ने राजा का घेराव कर उन्हें बस्तर वापस लौटने के लिए निवेदन किया। स्थिति को बिगड़ते देख दीवान गोपीनाथ ने भीड़ पर गोली चलवा दी जिसमें कुछ लोग मारे गए और कुछ को गिरफ्तार कर लिया गया। राजा बस्तर लौटने के लिए विवश हुआ।
दीवान गोपीनाथ ने दमन-चक्र आरंभ किया। इससे त्रस्त होकर मुरिया आदिवासियों ने झाड़ा सिरहा के नेतृत्व में विद्रोह करने का निश्चय किया। उन्होंने प्रत्येक गांव को एक तीर भेजना शुरू किया। आरापुर नामक स्थान पर लगभग 700 विद्रोही इकट्ठा हुए और उन्होंने हथियार जुटाने शुरू किये।
विद्रोही की गतिविधियों की जानकारी होने पर राजा स्वयं उन्हें शांत करने और समझाने पहुँचा। पर कोई नतीजा नहीं निकला। विद्रोहियों ने सुरक्षा सैनिकों पर धावा बोल दिया। राजा की सेना और विद्रोहियों के बीच युद्ध हुआ जिसमें छः विद्रोही मारे गए। राजा के हाथी सैनिकों के आने पर विद्रोहियों ने हथियार डाल दिए और आरापुर से पलायन कर गए।
राजा और दीवान राजधानी जगदलपुर लौट आए। उन्होंने किले को चारों ओर से सुरक्षित कर दिया क्योंकि उन्हें विद्रोहियों के आक्रमण का अंदेशा था। उनका अंदेशा सही साबित हुआ। विद्रोहियों ने झाड़ा सिरहा के नेतृत्व में 2 मार्च, 1876 ई० को राजमहल को चारों ओर से घेर लिया।
 इससे मुक्ति पाने के लिए राजा ने अंग्रेज अधिकारी से निवेदन किया। बस्तर के प्रशासन पर नियंत्रण रखने का दायित्व सिरोंचा स्थित डिपती कमिश्नर को सौंपा गया था। डिप्टी कमिश्नर ने राजा की रक्षा के लिए मेक जार्ज के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना भेजी। मेक जार्ज ने सर्वप्रथम विद्रोहियों से यह जानने का प्रयास
इतिहास किया कि विद्रोह का कारण क्या है। विद्रोहियों ने बतलाया कि उनकी लड़ाई राजा से नहीं वरन् दीवान एवं मुंशी से है। विद्रोही आदिवासियों ने अपनी एक सूत्री मांग प्रशासन के समक्ष रखी कि दीवान गोपीनाथ और मुंशी आदिल प्रसाद को बस्तर से निष्कासित किया जाए।
मैक जार्ज ने 8 अप्रैल, 1876 ई० को एक विशेष दरबार का आयोजन कर विद्रोहियों की मांग के अनुरूप निर्देश दिया। मांग के पूरा होते ही विद्रोही आदिवासियों ने अपनी घेराबंदी उठा ली। इस प्रकार, मुरिया विद्रोह सफलता के साथ समाप्त हुआ।

9. रानी चोरिस/रानी का विद्रोह : 1878-82 ई०

रानी का विद्रोह सीमित एवं अल्पकालीन था। इसे ‘रानी के कोप’ के नाम से भी जाना जाता है। बस्तर की रानी जुगराज कुँवर ने अपने पति भैरमदेव के गलत कार्यों के खिलाफ नाराजगी प्रकट करते हुए यह विद्रोह किया। रानी और राजा के पक्ष में आदिवासियों के परस्पर दो विरोधी दल बन गए, जो एक दूसरे के दुश्मन हो गए। इसके पीछे अंग्रेजों के षडयंत्र होने का संदेह किया गया। अंततः रानी की जीत हुई और राजा सही रास्ते पर लौट आया।

10. महान भूमकाल : 1910 ई०

भूमक या भूमकाल का अर्थ है भूकम्प या भूमि का कम्पन अर्थात् उलट-पुलट । वर्ष 1910 ई० में बस्तर में हुआ आदिवासी आंदोलन बड़ा और व्यापक आंदोलन था। इसी कारण इसे ‘महान भूमकाल’ की संज्ञा दी जाती है। इस आंदोलन में भाग लेने वाले प्रमुख नेता थे—गुण्डाधूर, कुँवर बहादुर सिंह, बाला प्रसाद, नाजिर, दुलार सिंह आदि जिनमें गुण्डाधूर का स्थान सर्वप्रमुख था।
कारण :
1. राजपरिवार के षडयंत्र : बस्तर के राजा रुद्र प्रताप देव के चाचा लाल कालिन्द्र सिंह आदिवासियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय थे और उनकी सहायता से वे रियासत में महत्वपूर्ण पद प्राप्त करना चाहते थे। उनकी इस चाह ने वर्ष 1910 ई० के विद्रोह को जन्म दिया। राजा रुद्र प्रताप देव की सौतेली माँ रानी सुवर्ण कुँवर अपनी उपेक्षा से असंतुष्ट थी इसलिए उन्होंने आंदोलनकारियों का साथ दिया।
2. दीवान बैजनाथ पण्डा की कार्यवाही : आदिवासी, दीवान बैजनाथ पंडा से नाराज गै क्योंकि दीवान ने आरक्षित वन पद्धति को बढ़ावा दिया था। बेगार व भूमि संबंधी विवाद ने स्थिति को और विस्फोटक बना दिया। इसके लिए आदिवासी, दीवान को ही एकमात्र दोषी मानते थे। आदिवासी, दीवान से इसलिए भी नाराज थे कि वह उन्हें राजा से प्रत्यया भेंट करने की इजाजत नहीं देता था।
 
3. अधिकारी-कर्मचारी, ठेकेदारों द्वारा शोषण : रियासत के अधिकारी और कर्मचारी आदिवासियों से दुर्व्यवहार करते थे। वे आदिवासियों के समक्ष अन्यायपूर्ण मांग रखते थे। परसर में जो लोग बाहर से आए थे, वे व्यापार के माध्यम से आदिवासियों का शोषण करते थे। शराब-ठेकेदारों का शोषण भी आदिवासियों के असंतोष का कारण था।
4. ब्रिटिश हस्तक्षेप : आदिवासियों के असंतोष का एक बड़ा कारण ब्रिटिश हस्तक्षेप था। कार के आदिवासी अपने राजा को ही सर्वशक्तिमान मानते थे और अपने राजा द्वारा ही आसित होना चाहते थे। वे बाहर से थोपे गए किसी ब्रिटिश अधिकारी को मानने के लिए धार नहीं थे। ब्रिटिश हस्तक्षेप से आदिवासी आंदोलित हो उठे और उन्होंने नारा बुलंद किया। ‘बस्तर, बस्तरवालों का है’।

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