head छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता सेनानी सामान्य ज्ञान | CG Swatantrata Senani GK

छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता सेनानी सामान्य ज्ञान | CG Swatantrata Senani GK

 Chhattisgarh Swatantrata Senani: CGPSC AND CG VYAPAM

छत्तीसगढ़ का सम्पूर्ण सामान्य ज्ञान Cg Question Answer in Hindi: Click Now

  1. वीर नारायण सिंह (1795-1857 ई०) : वीर नारायण सिंह बिंझावार के पिता का नाम राम राय था, जो सोनाखान के जमींदार थे। राम राय के मरणोपरांत वे सोनाखान के जमींदार बने । वर्ष 1856 ई० में सोनाखान में पड़े अकाल के दौरान उन्होंने लोगों की जान बचाने के लिए माखन बनिया नामक व्यापारी के गोदाम का अनाज अकाल पीड़ितों में बांट दिया। व्यापारी के शिकायत पर उन्हें जेल में डाल दिया गया। मगर वे जेल से भाग निकले और 1857 के महाविद्रोह में कूद पड़े। 1857 के महाविद्रोह में भाग लेने के कारण उन्हें 10 दिसम्बर, 1857 ई० को फांसी दे दी गई। जिस चौक पर उन्हें फांसी दी गई वह आज जय स्तम्भ चौक नाम से प्रसिद्ध है। उन्हें ‘छत्तीसगढ़ का प्रथम शहीद’ कहा जाता है। छत्तीसगढ़ का यह प्रथम शहीद एक आदिवासी वीर था।
  2. वीर सुरेन्द्र साय (1809-1884 ई०): जन्म स्थान : रिवड़ा ग्राम, सम्बलपुर जिला; पिता : धर्म सिंह (क्षत्रिय राजवंश)। सम्बलपुर रियासत के सही उत्तराधिकारी सुरेन्द्र साय थे पर अंग्रेजों ने उनके स्थान पर नारायण सिंह को राजा बना दिया। फलस्वरूप सुरेन्द्र साय ने अंग्रेजों एवं नारायण सिंह के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। 1857 के महाविद्रोह के दौरान सुरेन्द्र साय ने अंग्रेजों के नाक में दम कर दिया। उनकी विद्रोही गतिविधियों का क्षेत्र सम्बलपुर, बिलासपुर तथा कालाहांडी तक विस्तृत था। उन्होंने अंग्रेजों को खूब छकाया। पर अंततः 23 जनवरी, 1862 ई० को उन्हें उनके घर से गिरफ्तार कर लिया गया और रायपुर जेल भेज दिया गया।रायपुर जेल से उन्हें नागपुर जेल भेजा गया। कुछ समय बाद नागपुर जेल से असीरगढ़ के किले में भेज दिया गया। उनके अंतिम दिन इसी किले में बीते। अंतिम समय में वे अंधे हो गए थे और बेवसी की हालत में 28 फरवरी, 1884 ई० को असीरगढ़ के किले में उनकी स्वाभाविक मौत हो गई। सुरेन्द्र साय को ‘1857 के महाविद्रोह का अंतिम शहीद’ कहा जाता है।
  1. वीर हनुमान सिंह : 1857 के महाविद्रोह के छत्तीसगढ़ी नायकों में से एक। रायपुर फौजी छावनी में मैग्जीन लश्कर हनुमान सिंह ने रायपुर में विद्रोह का नेतृत्व किया। वह मूलतः वैसवाड़ा का राजपूत था। विद्रोह के समय उसकी अवस्था लगभग 35 वर्ष की थी।18 जनवरी, 1858 को हनुमान सिंह ने तीसरी टुकड़ी के सार्जेण्ट मेजर सिडवेल की उसके घर में घुसकर हत्या कर दी। इसके बाद उन्होंने पुलिस शिविर के सिपाहियों को विद्रोह करने के लिए उकसाया। 22 जनवरी, 1858 ई० को 17 विद्रोही सिपाहियों को फांसी दे दी गई। इस विद्रोह का नेता हनुमान सिंह घटना के बाद फरार हो गया। इसके बाद हनुमान सिंह के बारे में कोई विवरण नहीं मिलता। वीर हनुमान सिंह को ‘छत्तीसगढ़ का मंगल पाण्डे’ कहा जाता है।
  2. पं० सुंदरलाल शर्मा (1881-1940 ई०): जन्म : राजिम के निकट चंद्रसूर (चमसुर) के एक ब्राह्मण परिवार में। उनके पिता जियालाल तिवारी कांकेर रियासत में वकालत का कार्य करते थे। पं० सुंदरलाल शर्मा बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे एक ही साथ साहित्यकार, मूर्तिकार, चित्रकार, शिक्षाविद, स्वतंत्रता सेनानी व समाज सुधारक थे पर उनकी प्रसिद्धि मुख्यतः स्वतंत्रता सेनानी व अछूतोद्धारक के रूप में है। वे 1905 ई० के बंग-भंग विरोधी आंदोलन के दौरान राजनीति से जुड़े। वे वर्ष 1906 ई० में कांग्रेस के सदस्य बने और जीवनपर्यंत कांग्रेसी बने रहे। वे वर्ष 1907 ई० के सूरत अधिवेशन में शामिल हुए और वहाँ से लौटकर रायपुर में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के अंगीकार के प्रचार-प्रसार में जुट गए।वर्ष 1907 ई० में ही उन्होंने राजिम में संस्कृत पाठशाला की स्थापना की। पं० शर्मा ने वर्ष 1920 ई० के कण्डेल नहर सत्याग्रह (धमतरी तहसील) के सूत्रधार की भूमिका निभाई। पं० शर्मा के आग्रह पर ही गांधीजी अपनी प्रथम छत्तीसगढ यात्रा पर आए। पं० शर्मा वर्ष 1922 ई० के सिहावा-नगरी के वन सत्याग्रह में सूत्रधार की भूमिका निभाई। इसी क्रम में उन्हें वन कानून की अवहेलना के आरोप में गिरफ्तार किया गया और उन्हें 11 वर्ष का सश्रम कारावास दिया गया। दिसम्बर, 1923 ई० में कांग्रेस के काकीनाड़ा अधिवेशन (आंध्र प्रदेश) में भाग लेने के लिए छत्तीसगढ़ से पैदल जाने वालों में पं० शर्मा भी एक थे। इस अधिवेशन में मुख्यतः अछूतोद्धार का मामला उठाया गया।

    इस अधिवेशन से लौटने के उपरांत पं० शर्मा अछूतोद्धार के काम में जी-जान से जुट गए। उन्होंने अछूतों को स्वच्छता से रहने, जनेऊ धारण करने तथा शराब न पीने के लिए प्रेरित किया। पं० शर्मा के प्रयासों से रायपुर में सतनामी आश्रम, हरिजन पुत्रीशाला एवं वाचनालय स्थापित हुए। उन्होंने निष्कासित हिन्दुओं के लिए शुद्धिकरण आंदोलन भी चलाया। वे मंदिरों में हरिजनों के प्रवेश के समर्थक थे और अपने नैतिक बल के आधार पर ही उन्होंने राजिम के मंदिर में हरिजन प्रवेश को उस युग में संभव कर दिखाया।

    इसीलिए गांधीजी जब 1933 ई० में छत्तीसगढ़ की यात्रा पर दूसरी बार आए तो उन्होंने पं० शर्मा० के अछूतोद्धार कार्यक्रम की प्रशंसा की और उन्हें इस मामले में अपना अग्रज या गुरु कहकर सम्मानित किया। सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34) के दौरान उन्हें 20 अप्रैल 1932 ई० को गिरफ्तार किया गया। पं० शर्मा ने कई ग्रंथों की रचना की जिनमें ‘प्रह्लाद चरित्र’, ‘करुणा पचीसी’ और ‘सतनामी भजनमाला’ उल्लेखनीय है। 28 दिसम्बर, 1940 ई० को पं० शर्मा की मृत्यु हो गई। पं० शर्मा को ‘छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय जागरण का अग्रदूत’ कहा जाता है।

  1. ठाकुर प्यारेलाल सिंह (1891-1954 ई०): जन्म स्थान : देहोन ग्राम, राजनांदगांव तहसील, दुर्ग जिला; पिता : ठाकुर दीन दयाल सिंह। वर्ष 1905 ई० में ठाकुर प्यारेलाल सिंह के नेतृत्व में छात्रों की पहली हड़ताल हुई। वर्ष 1909 ई० में उन्होंने राजनांदगांव में सरस्वती पुस्तकालय की स्थापना की । बाद में यह राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र बना।1916 ई० में उन्होंने वकालत आरंभ की। गांधीजी के आह्वान पर 1920 ई० में वे असहयोग आंदोलन में कूद पड़े। वर्ष 1923 ई० के नागपुर झण्डा सत्याग्रह में भाग लेने के लिए दर्ग से सत्याग्रही भेजने का दायित्व ठाकुर साहब को सौंपा गया। उन्हें ‘छत्तीसगढ़ के मजदूर आंदोलन का अग्रदूत’ कहा जाता है। उनके नेतृत्व में छत्तीसगढ़ का प्रथम मजदूर आंदोलन (1920 ई०), द्वितीय मजदूर आंदोलन (1924 ई०) व तृतीय मजदूर आंदोलन (1937 ई०) हुआ। द्वितीय मजदूर आंदोलन के दौरान उन्हें राजनांदगांव से निष्कासित कर दिया गया। निष्कासन के बाद वे रायपुर आ गए और अंत तक वहीं रहकर अपने राजनीतिक कार्यों का संचालन करते रहे। सविनय अवज्ञा आंदोलन के प्रथम चरण (1930-31ई०) के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर एक वर्ष की सजा दी गई। दूसरे चरण (1932-34 ई०) के दौरान उन्हें दुबारा गिरफ्तार कर 2 वर्ष की सजा व जुर्माना किया गया। जुर्माना न देने के कारण उनकी संपत्ति कुर्क कर ली गई और वकालत की सनद भी जब्त कर ली गई।

    छत्तीसगढ़ के वे पहले व्यक्ति थे जिनकी वकालत की सनद जब्त की गई। जेल से छूटने के बाद वे स्वतंत्रता आंदोलन के लिए समर्पित हो गए। वर्ष 1937 ई० में वे विधान सभा के सदस्य चुने गए। उन्होंने छत्तीसगढ़ एजुकेशन सोसाइटी (1937 ई०) की स्थापना की और रायपुर में छत्तीसगढ़ महाविद्यालय की स्थापना में उल्लेखनीय योगदान दिया। वे छत्तीसगढ़ में सहकारिता आंदोलन के जनक थे। उन्होंने 1945 ई० में छत्तीसगढ़ बुनकर सहकारी समिति की स्थापना की। वर्ष 1951 ई० में ठाकुर साहब ने कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया। वे अब भूदान आंदोलन से जुड़ गए। उन्होंने पैदल घूमकर भूदान के लिए जन-मानस तैयार किया। उनकी इस पैदल यात्रा का उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। फलतः 20 अक्तूबर, 1954 ई० को उनकी मृत्यु हो गई। पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्हें ‘राष्ट्रबंधु’ (1910 ई०) नामक अर्द्ध साप्ताहिक पत्रिका की शुरुआत करने का श्रेय है। ____

  1. पं० रविशंकर शुक्ल (1877-1956 ई०) : जन्म : सागर नगर के खुशीपुरा वार्ड के एक ब्राह्मण परिवार में। उन्होंने छत्तीसगढ़ के राष्ट्रीय आंदोलन में केन्द्रीय भूमिका निभाई। उन्होंने होमरूल लीग आंदोलन (1916-18 ई०), रॉलेट सत्याग्रह (1919 ई), असहयोग आंदोलन (1920-22 ई०), स्वराज दल (1923-26 ई०), सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34 ई०), कांग्रेस मंत्रिमंडल (1937-39 ई०) के प्रधान, भारत छोड़ो आंदोलन (1942 ई०), संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य के रूप में भाग लिया। 15 अगस्त, 1947 ई० को देश स्वतंत्र हुआ और वे मध्य प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने । वे इस पद पर मरने के दिन तक यानी 31 दिसम्बर, 1956 ई० तक बने रहे।
  2. ई० राघवेन्द्र राव (1889-1942 ई०): ई० राघवेन्द्र राव के पूर्वज आंध्र प्रदेश से नागपुर आये थे और फिर स्थायी रूप से बिलासपुर में बस गए थे। वे बिलासपुर के एक प्रभावी राजनेता थे। वर्ष 1936 ई० में वे अस्थायी रूप से मध्य प्रदेश के गवर्नर बनाये गए। वर्ष 1937 ई० में उन्होंने विरोधी पार्टी के नेता के रूप में पर्याप्त यश अर्जित किया। वर्ष 1939 ई० में वे लंदन में भारत विभाग के सदस्य बने और वर्ष 1941 ई० में वे गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद् (Executive Council) के प्रतिनिधि बने। इन पदों पर नियुक्त होने के बावजूद वे देश के राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े रहे और छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व करते रहे।
  3. ठाकुर छेदीलाल (1887-1956 ई०): जन्म स्थानः अकलतरा, बिलासपुर; बिलासपुर के प्रथम बैरिस्टर; राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान बिलासपुर का प्रतिनिधित्व करने वालों में से एक; कृतिः ‘हालैण्ड स्वाधीनता का इतिहास’।
  1. घनश्याम सिंह गुप्त ((जन्म : 1885 ई०) : जन्म : दुर्ग जिला; राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान दुर्ग जिला का प्रतिनिधित्व करने वालों में से एक; प्रमुख कृतियाँ : ‘महाराजा प्रताप सिंह’, ‘अफजल खाँ की तलवार’, ‘शिवाजी का बघनखा’, ‘मेरे स्मरण’, ‘गांधीजी की नजर में हिन्दी’ आदि।
  2. 1 मुंशी अब्दुल रऊफ ‘महबी’ (1894-1945 ई०): जन्म : रायपुर; राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान रायपुर का प्रतिनिधित्व करने वालों में से एक; रायपुर के पाँच पाण्डवों में एक (नकुल); तबीयत से शायर व ‘महबी’ उपनाम से शायरी।
  3. पं० वामनराव लाखे (1872-1948 ई०) : जन्म : रायपुर, राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान रायपुर जिला का प्रतिनिधित्व करने वालों में से एक; रायपुर के पांच पाण्डवों में से एक (युधिष्ठिर); रायपुर जिला में सहकारिता के जनक (रायपुर कोआपरेटिव सेंट्रल बैंक की स्थापना : 1930, बलौदा बाजार में किसान कोआपरेटिव मिल्स की स्थापना : 1945)
  4. पं० रत्नाकर झा (1896-1973 ई०) : जन्म स्थान : अंजनिया गांव, खैरागढ़ रियासत; राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान दुर्ग जिला का प्रतिनिधित्व करने वालों में से एक; दुर्ग जिला में सहकारिता के जनक।
  5. क्रांति कुमार भारतीय (1894-1976 ई०): जन्म : कलकत्ता में एक राजस्थानी ब्राह्मण परिवार में; राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान रायपुर जिला में क्रांतिकारी गतिविधियों को संचालित करने वालों में एक; पत्रकारिता के क्षेत्र में बिहार से ‘मुक्ति’, रायपुर से ‘छत्तीसगढ़ केसरी’ एवं बिलासपुर से ‘कर्मक्षेत्र’ का प्रकाशन।
  6. यति यतनलाल (1894-1976 ई०) : जन्म : बीकानेर; महासमुन्द के जैतू साह मठ से संबंधित; महासमुन्द तहसील में वन सत्याग्रह के सूत्रधार; गांधीजी के निर्देशानुसार ग्रामोद्योग, अनुसूचित जाति उत्थान व हिन्दू-मुस्लिम एकता की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य।
  7. गुण्डाधूर : धुरवा जाति के गुण्डाधूर बस्तर भूमकाल (1910 ई० का आदिवासी विद्रोह) के प्रधान नेता थे। उन्होंने अंग्रेजों के आतंक से त्रस्त बस्तर की जनता के बीच विद्रोह की ज्वाला भड़काई। वे बस्तर से अंग्रेजों को भगाकर यहाँ की जनता को सुखशांति प्रदान करना चाहते थे। वे बस्तर के इतिहास पुरुष थे जिनकी प्रेरणा और किस्से आज भी यहाँ के लोकगीतों में पाए जाते हैं।
  8. खूबचंद बघेल (1900-69 ई०) : जन्म : रायपुर जिले के पथरी गांव के एक किसान परिवार में। असहयोग आंदोलन (1920-22 ई०) के दौरान उन्होंने असहयोग का प्रचार-प्रसार किया। सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-34 ई०) के दौरान उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। गांधीजी द्वारा संचालित अछूतोद्धार कार्यक्रम में भाग लिया। व्यक्तिगत सत्याग्रह (1940-41 ई०) के दौरान उन्हें तीसरी बार जेल जाना पड़ा। भारत छोड़ो आंदोलन (1942 ई०) में भाग लेने के कारण भी उन्हें जेल की हवा खानी पड़ी। वर्ष 1946 ई० में प्रदेश में शुक्लजी के मंत्रिमंडल में उन्हें संसदीय सचिव व स्वास्थ्य विभाग का दायित्व सौंपा गया पर उन्होंने किसानों एवं जनहित के लिए मंत्री पद का परित्याग कर दिया। वर्ष 1951 ई० में वे जे० बी० कृपलानी के आह्वान पर किसानमजदूर पार्टी में शामिल हो गए। वे दो बार विधान सभा सदस्य के रूप में निर्वाचित हुए। कुछ समय बाद वे पुनः कांग्रेस में शामिल हो गए और 1967 ई० में वे राज्य सभा के लिए निर्वाचित हुए।
    छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने 1956 ई० में राजनांदगांव में ‘छत्तीसगढ़ महासभा’ तथा 1967 ई० में रायपुर में ‘छत्तीसगढ़ भातृ संघ’ का गठन किया । वे किसान आंदोलन से भी गहरे रूप से जुड़े हुए थे। जब प्रांतीय सरकार ने धान के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया तब इसके खिलाफ उन्होंने वाग नदी सत्याग्रह किया। भिलाई इस्पात संयंत्र की स्थापना के समय उन्होंने किसानों की उनकी भूमि का मुआवजा दिलाने के लिए संघर्ष किया, जिसमें वे सफल हुए। जब उड़ीसा में हीराकुण्ड बांध का निर्माण हुआ तब रायगढ़ के किसानों की जमीन डूब-क्षेत्र में आ गई। पीड़ित किसानों को मुआवजा दिलाने के लिए संघर्ष किया जिसमें भी वे सफल हुए। इस प्रकार, वे स्वतंत्रता सेनानी, छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के नेता और किसानों के उद्धारक थे।

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