छत्तीसगढ़ का भूगोल भौतिक स्वरूप सामान्य ज्ञान CGPSC & VYAPAM gk

By Raj Markam

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छत्तीसगढ़ का सम्पूर्ण सामान्य ज्ञान Cg Mcq Question Answer in Hindi: Click Now

छत्तीसगढ़ प्रदेश भारत के वृहद प्रायद्वीपीय पठार के उत्तर-पूर्वी भाग में फैला हुआ है। भौतिक विभिन्नता के आधार पर यहाँ मैदानों, पठारी, पहाड़ी और पाट प्रदेश स्पष्टतः दृष्टिगोचर होते हैं। इसे निम्नलिखित चार भौतिक विभागों में विभाजित किया जा सकता है- 1. पहाड़ी प्रदेश 2. पठारी प्रदेश 3. पाट प्रदेश तथा 4. मैदानी प्रदेश।
1. पहाड़ी प्रदेश : छत्तीसगढ़ राज्य चारों तरफ से वनाच्छादित पहाड़ियों से घिरा हुआ है। इसकी सामान्य ऊँचाई 1000 से 3000 मीठर तक है। प्रदेश के धरातलीय स्वरूप का निर्धारण पहाड़ियों के घुमावदार भू-रूप से हुआ है। यहाँ मैदानी क्षेत्र की अपेक्षा जनसंख्या बहुत कम है। भूगर्भिक संरचना में विभिन्नता तथा नदियों के अपरदन के फलस्वरूप उच्च भूमि अनेक श्रेणियों एवं पहाड़ियों में विभक्त है। इसे निम्नलिखित चार भागों में विभाजित किया जा सकता है___
(i) मैकाल श्रेणी : यह छत्तीसगढ़ मैदान के पश्चिमी एवं उत्तरी-पश्चिमी भाग पर सतपुड़ा पर्वत की बाहरी दीवार के रूप में विस्तृत है। इसकी ऊँचाई मैदान से पश्चिम की ओर क्रमशः अधिक होती गई है। यह श्रेणी बिलासपुर एवं राजनांदगाँव जिले की सीमा में दक्षिणी-पूर्वी एवं उत्तर-पूर्वी दिशा में विस्तृत है।
यह नर्मदा एवं महानदी प्रवाह प्रणाली को विभाजित करती है। इस श्रेणी की समुद्र तल से ऊँचाई 450-1000 मीटर के मध्य है। इसमें कई ऊँचे-ऊँचे कगार हैं, जिसमें चिल्पी घाट, बृजपानी घाट आदि प्रमुख हैं। ये घाटियाँ प्राकृतिक वनस्पति के सघन आवरण से ढकी हुई हैं। पहाड़ की ऊँचाइयों में विषमता है। इस श्रेणी के विभिन्न भाग अलग-अलग प्रकार के चट्टानों से बने हैं। अतः पहाड़ की ऊँचाइयों में विषमता पायी जाती है।
(ii) छुरी-उदयपुर की पहाड़ियाँ : ये दोनों पहाड़ियाँ अत्यधिक विच्छेदित हैं और मांड नदी द्वारा एक दूसरे से अलग होती हैं। इन पहाड़ियों की ऊँचाई 600 से 1000 मीटर के मध्य है। छुरी की पहाड़ियाँ बिलासपुर जिले में हसदो नदी के पूर्वी भाग में स्थित है। उदयपुर की पहाड़ियाँ छुरी की पहाड़ियों के पूर्व में स्थिती है। उदयपुर की पहाड़ियों का उत्तरी-पश्चिम की ओर उदयपुर तहसील की उच्च भूमि इस पठार की सीमा निर्धारित करती है। यहाँ मांड नदी 400 मीटर गहरी खडी ढाल वाली घाटी बनाती है।
यह एक दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र जहाँ सघन वन हैं तथा घाटियाँ चट्टानों एवं तीव्र ढाल वाली है। छुरी की पहाड़ियाँ छोटी-छोटी ऊँची तीखी चोटियों से बनी हैं। इसकी ढ़ाल हसदो नदी घाटी की ओर तीव्र है। उदयपुर की पहाड़ियाँ कम ऊँची तथा अधिक अपरदित है। कुरकुट एवं केलों के शीर्ष इन पहाड़ियों में स्थित है।
(iii) चांगभखार-देवगढ़ पहाड़ियाँ – इन पहाड़ियों का विस्तार प्रदेश के उत्तरी भाग में है। इसके अन्तर्गत जनकपुर, बैकुण्ठपुर, मनेन्द्रगढ़, उत्तरी सूरजपुर, प्रतापपुर, उत्तरी अम्बिकापुर, पश्चिमी कुसमी एवं दक्षिणी, रामानुजगंज, तहसीलें सम्मिलित हैं । इसकी समुद्र तल से औसत ऊँचाई 600 से 1000 मीटर है। इसकी सबसे ऊँची चोटी देवगढ़ है, जिसकी ऊँचाई 1027 मीटर है। ये बलुआ पत्थर की विषम पहाड़ियाँ हैं । लम्बी सकरी पहाड़ी शृंखलाएँ एक दूसरे से गहरी अवनलिकाओं से अविच्छिन्न हो गयी हैं । अवनलिकाओं का निर्माण यहाँ के भंगुर बलुआ पत्थर पर तीव्र वर्षा के प्रभाव से हुआ है।
(iv) अबुझमाड़ की पहाड़ियाँ : यह दण्डकारण्य के मध्य पश्चिमी भाग में विस्तृत है। इसका अधिकांश भाग नारायणपुर तहसील के दक्षिणी-पश्चिमी भाग में पाया जाता है तथा शेष भाग बीजापुर तहसील की उत्तरी पट्टी है । नारायणपुर से दक्षिण की ओर पहाड़ी की लम्बाई 100 किमी. तथा चौडाई 800 मीटर है।
यह पहाडी क्षेत्र अत्यंत विच्छेदित पठार से निर्मित है। अबुझमाड़ की पहाड़ियाँ पश्चिम से नारायणपुर तहसील की पश्चिमी सीमा से आरम्भ होकर पूर्व की ओर नारायणपुर तथा छोटे डोंगर तक लगभग 60 किमी चौडाई में फैली हुई है। सोनपुर की घाटी इन पहाड़ियों के उत्तरी सीमावर्ती भाग को शेष भाग से अलग करती है। इन्द्रावती की घाटी अबुझमाड़ को दक्षिण की ओर सीमांकित करती है।
2.पठारी प्रदेश : छत्तीसगढ़ राज्य के पठारी प्रदेश को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है
(i) पेण्ड्रा-लोरमी पठार : पेण्ड्रा का पठार छत्तीसगढ़ मैदान की उत्तरी-पश्चिमी सीमा पर दीवार की तरह फैला है। लोरमी का पठार मुंगेली तहसील की उत्तरी पश्चिमी सीमा पर स्थित है। लोरमी पठार की सामान्य ऊँचाई 700 से 900 मीटर के मध्य है। इस पठार का अधिकतम क्षेत्र वनों से घिरा हुआ है। इस पठार में मैदान तथा बेसीन की ओर खड़े कगार हैं। इसके अन्तर्गत पेण्ड्रा, कटघोरा, लोरमी एवं पण्डरिया तहसीलें सम्मिलित हैं।
(i) धमतरी-महासमुन्द उच्च भूमि : यह सीमान्त क्षेत्र में स्थित है। इसका विस्तार धमतरी, कुरूद, राजिम, महासमंद, गरियाबंद, सरायपाली, एवं देवगढ़ तहसीलों में है। इसकी समुद्र तल से औसत ऊँचाई 400 से 900 मीटर है।
(iii) बस्तर का पठार : यह छत्तीसगढ़ प्रदेश का विशिष्ट भू-भाग है। इसे दण्डकारण्य का पठार भी कहते हैं। इसकी समुद्र तल से औसत ऊँचाई 600 मीटर तथा अधिकतम ऊँचाई 762.5 मीटर है। उत्तर में यह छत्तीसगढ़ मैदान तथा दक्षिण में बीजापुर पठार से घिरा है। इसके पूर्व में जगदलपुर का पठार है। इसका सामान्य ढाल पूर्व से पश्चिम की ओर है। यह पठार घने वनों से आच्छादित है।
खनिज सम्पदा की दृष्टि से यह पठार बहुत ही सम्पन्न है। इसके अन्तर्गत बस्तर जिला एवं रायपुर जिले का दक्षिणी भाग सम्मिलित है। इस पठार का विस्तार राज्य की चारमा, काँकेर, केसकाल, कोंडागाँव, जगदलपुर, दन्तेवाड़ा, अन्तागढ़ एवं बीजापुर तहसीलों में है।
(iv) दुर्ग उच्च भूमि : यह पश्चिम की ओर रायपुर उच्च प्रदेश के समानान्तर विस्तृत है। इस क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण धरातलीय स्वरूप डल्ली-राजहरा की पहाड़ियाँ हैं जो दुर्ग जिले के दक्षिण भाग पर 700 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। यह प्रदेश लौह-अयस्क के लिए प्रसिद्ध है। इस प्रदेश का अधिकांश भाग वनाच्छादित है। यहाँ मैदानी क्षेत्र की तुलना में जनसंख्या बहुत ही कम है।
सरगुजा बेसिन
3. पाट प्रदेश : यह भी पठारी क्षेत्र ही है किन्तु इसका धरातल सीढ़ीनुमा होता है। पाट पुरानी सम्प्राय भूमि का क्षेत्र है जिनका उत्थान हो जाने से वे ऊँचे हो गए हैं। प्रदेश के पाट प्रदेश को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है
(i) मैनपाट : यह सरगुजा जिले के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित एक महत्वपूर्ण समतल उच्च भूमि है। मैनपाट की मुख्य श्रेणी 24 किमी. लम्बी और 12 किमी. चौडी है, जो रायगढ़ की सीमा बनाती है। उत्तर-मध्य में यह दक्षिणी अम्बिकापुर एवं सीतापुर तहसीलों में विस्तृत है। इसकी समुद्र तल से औसत ऊँचाई 1152 मीटर है। इन पर लैटेराइट मिट्टियाँ तथा कहीं-कहीं ट्रेप चट्टानें मिलती हैं। यहाँ की श्रेणी बेसीन जैसा भूदृश्य उपस्थित करती है। वर्तमान में कोरबा स्थित एल्युमिनियम कारखाने को इसी क्षेत्र से बॉक्साइट की आपूर्ति होती है। यहाँ तिब्बती शरणार्थियों को बसाया गया है।
(ii) जारंग पाट : यह उत्तर-पूर्व में सीतापुर एवं लुण्ड्रा तहसीलों में विस्तृत है। इसकी समुद्र तल से औसत ऊँचाई 1145 मीटर है। यह पंडरापाट का विस्तार है।
(iii) सामरी पाट : यह पूर्वोत्तर सीमान्त भाग में सामरी तहसील में विस्तृत है। इसकी समुद्र तल से औसत ऊँचाई 700 से 1250 मीटर है। इसका पूर्वी भाग अधिक ऊँचा है, जिसे जमीर पाट कहते हैं। जमीर पाट उत्तर की ओर तहसील की सीमा के पास एक तीव्र ढाल के द्वारा नीचे उतरता है। यह पश्चिम की ओर कन्हार नदी की घाटी में उतरता है। यह क्षेत्र कन्हार एवं गेयोर नदियों द्वारा अपवाहित है। यहाँ कोटरी जलप्रपात है।
(iv) जशपुर पाट : यह छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा पाट प्रदेश है जो जशपुर जिले के जशपुर तहसील में विस्तृत है। इसका क्षेत्रफल 4300 वर्ग किमी है। ईब एवं मैनी नदियों के समतल उत्तर के पठारी एवं पाट भूमि को जशपुर पाट कहा जाता है। यह पाट महानदी के मैदान से ऊपर उठकर छोटानागपुर के पठार में विलीन हो जाता है। इस पाट प्रदेश का धरातल सीढीनुमा है।
जशपुर तहसील में मैनी नदी के उत्तर का सम्पूर्ण क्षेत्र जशपुर पाट है। इस पाट प्रदेश का अपवाह महानदी की शाखा ईब नदी, ब्राह्मणी की शाखा शंख नदी तथा गंगा की शाखा सोन की उपशाखा कन्हार नदी द्वारा होता है। पाट का ढाल वाला भाग वनों से एवं संकरी पाट वाला क्षेत्र कृषि योग्य भूमि से ढंका है। इस पाट प्रदेश में जशपुर नगर बसा है।
4.मैदानी प्रदेश : वह भाग जो समुद्र तल से 300 मी. से कम ऊँचा होता है, उसे मैदानी प्रदेश कहते हैं। इसमें उच्चावच बहुत कम होता है और धरातल समतल होता है। छतीसगढ़ के मैदानी प्रदेश को निम्नलिखित भागों में विभाजित किया जा सकता है
(i) छत्तीसगढ़ का मैदान : यह मध्य भारत का धान का क्षेत्र है। यह बघेलखण्ड पठार एवं सतपुड़ा के मध्य स्थित है। यह छत्तीसगढ़ प्रदेश के मध्य में लगभग 26680 वर्ग किमी क्षेत्र में पंखाकार रूप में फैला हुआ है। यह लगभग संरचनात्मक अपरदनात्मक मैदान है। 300 मीटर की समोच्च रेखा असमान रूप से छत्तीसगढ़ मैदान की सीमा बनाती है। मैदान के पूर्वी भाग की समुद्र तल से ऊँचाई लगभग 200 मी० एवं पश्चिमी भाग की ऊँचाई लगभग 330 मीटर है। ऊँचाई कहीं भी 400 मीटर से अधिक नहीं है।
उत्तर में यह मैदान सरगुजा एवं रायगढ़ के पठारों से घिरा है जबकि दक्षिण में बस्तर का पठार एवं पश्चिम में मैकाल श्रेणी स्थित है। मैदान लगभग मंद ढाल वाला है तथा वनाच्छादित है। मैदान का अधिकांश भाग कडप्पा क्रम के क्षैतिज रूप में विस्तृत लाइमस्टोन एवं शेल चट्टानों से बना है। मैदान का कुछ भाग जलोढ़ क्ले एवं छोटी पहाड़ियों के चिकना
होने से बना है। मैदानी घरातल पर मिट्टी का आवरण है जिसे चारों दिशाओं में बहने वाली महानदी, शिवनाथ, हसदो नदियों एवं उनकी सहायक नदियों ने काट दिया है। इस मैदानी प्रदेश के पूर्वी भाग में औसत वार्षिक वर्षा 1500 मिमी से अधिक होती है जबकि पश्चिमी भाग में यह 1300 मिमी होती है।
इस मैदानी प्रदेश में तापमान 43° से 12° के मध्य रहता है यह मैदान पीली मिट्टी की परतों से बना है जो सामान्यतः विभिन्न प्रकार की फसलों के लिए लाभकारी है। मैदानी प्रदेश की उपजाऊ मिट्टी चावल की कृषि के लिए उपयुक्त है। यह क्षेत्र लौह-अयस्क, एस्बेस्टस, चूना-पत्थर, बॉक्साइट आदि खनिजों की दृष्टि से सम्पन्न है। यह क्षेत्र कोसा उत्पादन के लिए भी प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र के अन्तर्गत रायपुर, दुर्ग, राजनांदगाँव, रायगढ़ का सम्पूर्ण भाग एवं बिलासपुर जिले का कुछ भाग सम्मिलित है।
इस मैदान को 2 उपप्रदेशों एवं 6 सूक्ष्म प्रदेशों में विभाजित किया जा सकता है।
(i) दुर्ग-रायपुर मैदान : यह छत्तीसगढ़ मैदान का दक्षिणी भाग है। यह भाग शिवनाथ एवं महानदी अपवाह क्षेत्र के अन्तर्गत आता है। इसकी ढाल उत्तर की ओर है। इस मैदान में रायपुर, दुर्ग, भिलाई आदि महत्वपूर्ण औद्योगिक एवं व्यापारिक नगर स्थित हैं। क्षेत्रीय विविधता के आधार पर इस मैदान को तीन उपविभागों में विभाजित किया गया है
(a) ट्रांस महानदी मैदान : इस मैदान का विस्तार महानदी के पश्चिम में है। इसके अन्तर्गत राजिम तहसील का पश्चिमी भू-भाग, रायपुर तहसील का दक्षिणी भाग एवं धमतरी तहसील का उत्तरी-पूर्वी भाग सम्मिलित है। इस मैदान का दक्षिण भाग एवं धमतरी तहसील का उत्तरी-पूर्वी भाग सम्मिलित है। इस मैदान का दक्षिणी भाग उपजाऊ है तथा लहरदार जंगलों से घिरा है।
(b) महानदी-शिवनाथ दोआब : यह छत्तीसगढ़ मैदान का मध्यवर्ती भाग है। इसकी औसत ऊँचाई 100 से 300 मीटर के मध्य है । इसके मध्य से खारुन नदी प्रवाहित होती है।
(c) ट्रांस शिवनाथ मैदान : यह एक समरूप मैदान है जिसकी समुद्र तल से औसत ऊँचाई 300 मीटर है। इसका विस्तार शिवनाथ नदी के पश्चिम में पूर्वी राजनांदगाँव एवं पश्चिमी दुर्ग जिले में 4500 वर्ग किमी क्षेत्र में हुआ है। यह मैदान शिवनाथ एवं उसकी सहायक नदियों के प्रवाह क्षेत्र में आता है इस मैदान में काली मिट्टी की प्रधानता देखने को मिलती है जो रबी फसलों के लिए उपयुक्त है।
(i) बिलासपुर-रायगढ़ मैदान : इस मैदान का विस्तार छत्तीसगढ़ मैदान के उत्तरी भाग में 11188 वर्ग किमी. क्षेत्र में है। शिवनाथ एवं महानदी इसकी दक्षिणी सीमा बनाती है। इसका उत्तरी भाग उच्च भूमि से घिरा है तथा खण्डित है। इस मैदान की औसत ऊँचाई 280 मीटर है जो दक्षिण की ओर कम हो जाती है।
मैदान का ढाल मंद तथा दक्षिण की ओर है। अरपा, हसदो, केलो, आगर एवं मनियारी इस मैदान से होकर प्रवाहित होने वाली मुख्य नदियाँ हैं। इस मैदान को तीन उपविभागों में बांटा गया है
(a) हसदो-मांड का मैदान : यह मैदान छत्तीसगढ़ मैदान का पूर्वी भाग है जो लीलागर नदी के पूर्वी भाग में रायगढ़ जिले के केलो नदी तक फैला हुआ है। इसकी उत्तरी सीमा पर चंवरढाल की पहाड़ियाँ हैं जो कडप्पा काल की क्वार्टजाइट चट्टानों से बनी है। यह हसदो तथा मांड नदियों द्वारा अपवाहित क्षेत्र है।
ये नदियाँ चौड़ी एवं रेतीली घाटियों में प्रवाहित होती हैं। ये नदियाँ चौडी एवं रेतीली घाटियों में प्रवाहित होती हैं। अधिक  वर्षा एवं अपरदन के कारण इस मैदान की भूमि का ढाल शिवनाथ मैदान की ढाल की तुलना में कुछ अधिक है। मैदान का ढाल उत्तर से दक्षिण होते हुए पूर्व की ओर है।
(b) विलासपुर का मैदान : यह मैदान छत्तीसगढ़ मैदान का उत्तरी भाग है। यह मैदान आगर, मनियारी, अरपा, तथा लीलागर नदियों के जलोढ़ से आच्छादित है। यह मैदान सामान्य तरंगित भूआकृति के रूप में है। इसकी औसत ऊँचाई 250 मीटर से कम है। इस मैदान का मध्य भाग अरपा तथा उसकी सहायक नदियाँ, जो पेण्ड्रा पठार से निकलती है के अपवाह क्षेत्र में है। यह मैदान का उपजाऊ भाग है एवं चावल की कृषि के लिए उपयुक्त है।
(c) रायगढ बेसिन : यह छुरी एवं उदयपुर की पहाड़ियों के बीच एक संक्रमणीय श्रृंखला के रूप में स्थित है। इसकी सतह अधिक चौरस नहीं है। रायगढ़ एवं धरमजयगढ़ के मध्य मैदान एकदम समतल है। इसकी दक्षिणी सीमा पर चंवरढाल की पहाड़ियाँ हैं। यह धनुष के आकार का बेसिन है जो 100.20 वर्ग किमी. क्षेत्र में विस्तृत है। इसकी ढाल मन्द है।
(iii) बस्तर का मैदान : यह छत्तीसगढ़ राज्य के दक्षिणी सीमांत क्षेत्र में स्थित है। यह गोदावरी तथा उसकी सहायक सबरी नदी का मैदान है। यह प्रदेश की दक्षिणी सीमा के उत्तर की ओर दक्षिणी पठार तथा उत्तर-पूर्वी पठार तक विस्तृत है। इसका विस्तार कोंटा तथा बीजापुर तक है। इसकी ऊँचाई 150 से 300 मीटर के मध्य है जबकि इसकी चौड़ाई लगभग 25 किमी है। इसका निर्माण ग्रेनाइट एवं नीस शैलों से हुआ है। _
(iv) कोटरी बेसिन : इसका विस्तार दक्षिणी-पश्चिमी सीमान्त क्षेत्र में है। यह पंखाजूर, भानुप्रतापपुर एवं दक्षिणी मोहला तहसीलों में फैला हुआ है। इसकी समुद्र तल से औसत ऊँचाई 300 से 450 मीटर के मध्य है।
(v) सारंगढ़ का मैदान : यह पूर्वी सीमान्त क्षेत्र में विस्तृत है जो सारंगढ तहसील के अन्तर्गत है। इसकी समुद्र तल से औसत ऊँचाई 300-400 मीटर के मध्य है।
महानदी के दक्षिणी भाग पर स्थित यह मैदान एक लम्बी किन्तु निचली पहाड़ी श्रेणी से दो भागों में विभक्त हो गया है। पश्चिमी भाग को सारंगढ का मैदान तथा पूर्वी भाग को सरिया का मैदान कहते हैं। लातनाला सारंगढ़ मैदान की मुख्य नदी है जबकि सरिया के मैदान की मुख्य नदी केंकराड़ी नाला है। यह एक कृषि प्रधान क्षेत्र है तथा यहाँ सघन जनसंख्य बसी है।
(vi) कोरबा बेसिन : यह छत्तीसगढ़ प्रदेश के उत्तर-मध्य में स्थित है। यह दक्षिण कटघोरा एवं दक्षिणी कोरबा तहसीलों में विस्तृत है। यह पश्चिम में पेण्ड्रा के पठार तथा पूर्व में छुरी पहाडियों के बीच में स्थित है।
यह 200 वर्ग किमी क्षेत्र में विस्तृत है। यह बेसिन हसदो नदी तथा उसकी सहायक अहिरन, ढेंगुरनाला तथा पुलाबडी द्वारा निर्मित है। इस बेसिन की सामान्य ऊँचाई 300 मीटर है। कहीं-कहीं अपरदनरोधी होने के कारण एकाकी पहाड़ियाँ एवं कटक दिखाई देती है। 4
 (vii) हसदो-रामपूरा बेसिन : यह बेसिन छत्तीसगढ़ प्रदेश के उत्तर में स्थित है। इसके अन्तर्गत उत्तरी कटघोरा, पूर्वी पेण्ड्रा तथा दक्षिणी मनेन्द्रगढ़ सम्मिलित हैं। इसकी समुद्र तल से औसत उँचाई 300 से 450 मीटर है। यह हसदो बेसिन का एक खुला निचला क्षेत्र है। बेसिन का स्वरूप अपरदनात्मक है। अपरदनरोधी होने के कारण कई जगह एकाकी पहाड़ियाँ दिखाई देते हैं। हसदो यहाँ की मुख्य नदी है। यहाँ कई जलप्रपात है। इस बेसिन के दक्षिण में पेण्ड्रा का पठार एवं छुरी की पहाड़ियाँ तथा उत्तर में कोरिया की पहाडियाँ है।
(viii) सरगुजा बेसिन : इस बेसिन का विस्तार प्रदेश के उत्तर-मध्य क्षेत्र में है। इसके अंतर्गत दक्षिणी प्रतापपुर, दक्षिणी सूरजपुर, अम्बिकापुर तथा पश्चिमी सीतापुर सम्मिलित हैं। इस बेसिन की समुद्र तल से औसत ऊँचाई 400 से 650 मीटर है। यह बेसिन उत्तर में देवगढ़ की पहाडियों, पूर्व में जमीरापाट, श्ररंगपाट एवं लहसुन पाट तथा दक्षिण में मैनपाट से घिरा ऊँचा पठारी मैदान है।
कर्क रेखा इसकी उत्तरी सीमा से होकर गुजरती है। रिहन्द इस बेसिन की मुख्य नदी है, जो दक्षिण से उत्तर दिशा में बहती हुई आगे सोन नदी में मिल जाती है । इस बेसिन में मुख्य रूप से धान एवं मक्का की कृषि होती है।
(ix) रिहन्द बेसिन : इस बेसिन का विस्तार प्रदेश के उत्तरी सीमान्त भाग में वाड्रफनगर तहसील में है। इस बेसिन की समुद्र तल से औसत ऊँचाई 300 से 450 मीटर है।
(x) कन्हार बेसिन : यह बेसिन प्रदेश के उत्तर-पूर्वी सीमान्त भाग में विस्तृत है। इसके अंतर्गत वाड्रफनगर एवं उत्तरी रामानुजगंज तहसील सम्मिलित है।
 

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