छत्तीसगढ़ की जनजातीय कलाएं Chhattisgarh Art gk

By Raj Markam

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जनजातीय कलाएं जनजातीय कलाएं दो प्रकार की होती है

प्रदर्शनकारी कलाएं एवं रूपंकर कलाएं। प्रदर्शनकारी कलाओं में नृत्य, नाटक आदि आते हैं। रूपंकर कलाओं के अंतर्गत वे सभी कलाएं आती हैं जिनके द्वारा जनजातीय लोग अपने कला भाव को रूप का आकार देते हैं। इनमें मिट्टी शिल्प, काष्ठ शिल्प, लौह शिल्प, कोसा शिल्प, पत्ता शिल्प, बांस शिल्प, कंधी शिल्प, धातु कला, गढ़वा शिल्प, प्रस्तर शिल्प इत्यादि सम्मिलित हैं।

  1. लोक नृत्य
  2. सुआ नृत्य : सुआ छत्तीसगढ़ में मूलतः महिलाओं और किशोरियों का नृत्य पर्व है। छत्तीसगढ़ी जनजीवन में सुआ नृत्य की लोकप्रियता सबसे अधिक है। इसमें सभी जाति वर्ग की स्त्रियां हिस्सा लेती है। दीपावली के कुछ दिन पूर्व से ही सुआ नृत्य शुरू होता है और दीपावली की रात्रि में शिव-गौरा विवाह के आयोजन से समापन होता है।

इस कारण सुआ नृत्य को गौरा नृत्य भी कहा जाता है। महिलाएं अपने-अपने गांवों से टोली बनाकर समीप के गांवों में भ्रमण करती है और प्रत्येक घर के सामने गोलाकार झुंड बनाकर ताली की थाप पर नृत्य करते हुए गीत गाती हैं। घेरे के बीच में एक युवती सिर पर लाल कपड़ा ढंके टोकनी लिये हुए होती है। टोकनी में धान भरकर उसमें मिट्टी के बने दो तोते सजाकर रख दिये जाते हैं। ये तोते शिव-पार्वती (गौरा) के प्रतीक माने जाते हैं। सुआ नृत्य करते समय टोकनी को बीच में रख दिया जाता है और लाल कपड़ा हटाकर तोते खुले कर दिये जाते हैं।

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फिर महिलाएं सामूहिक स्वर में सुआ-गीत गाती हुई वृत्ताकार में झुक-झुक कर ताली बजाते हुए नृत्य करती हैं। कभी-कभी सुआ गीत में प्रश्न-उत्तर शैली भी अपनाई जाती है। सुआ प्रेम का गीत नृत्य है। सुआ गीत में किशोरियां अपने प्रेमी को सुआ के माध्यम से संदेश भेजती है। धान कटाई के बाद सुआ नृत्य उत्तरी एवं मध्य छत्तीसगढ़ में अत्यधिक उमंग-उल्लास के साथ किया जाता है। सुआ नृत्य में जितनी नृत्य की केंद्रीयता है, उतना ही सुआ गीत भी महत्वपूर्ण है। सुआ गीत की पारम्परिक लोक धुन अत्यंत मधुर और प्रभावकारी है। सुआ गीत नारी जीवन के समस्त सुख-दुख और प्रेम-धान करूणा के गीत है।

  1. चन्देनी : लोरिक चंदा के नाम से ख्यात चन्देनी छत्तीसगढ़ में दो शैलियों में पाया जाता है। एक लोक कथा के रूप में तथा दूसरा गीत-नृत्य के रूप में। पुरुष पात्र विशेष वेश-भूषा में नृत्य के साथ चन्देनी कथा प्रस्तुत करता है। नृत्य-गीत रात भर चलता है। बीच-बीच में विदूषक जलती मशाल से करतब दिखाता है। चन्देनी नृत्य में टिमकी, ढोलक आदि की संगत परम्परागत है। लोरिक चंदा मूलतः प्रेमगाथा है।
  2. राउत नाचा : राउत नाचा राउत समुदाय का नृत्य है। यह दीपावली के अवसर पर किया जाने वाला एक परम्परागत नृत्य है। इस नृत्य में लोग विशेष वेशभूषा पहनकर हाथ में सजी हुई लकड़ी लेकर टोली में गाते और नाचते हुए निकलते हैं। गांव में प्रत्येक घर के मालिक को आशीर्वाद देते हैं। टिमकी, ढोलक, सिंग बाजा आदि इस नृत्य के प्रमुख वाद्य हैं। नृत्य के पहले दोहरे (दोहे) गाये जाते हैं। दोहे शृंगार, प्रेम, हास्य तथा पौराणिक सन्दर्भो को लिए हुए होते हैं।
  3. पंथी नाचा : पंथी छत्तीसगढ़ की सतनामी जाति का पारम्परिक नृत्य है। इस नृत्य में लोग विशेष वेश-भूषा पहनते हैं। किसी तिथि-त्योहार पर सतनामी ‘जैतखाम’ की स्थापना करते हैं और परम्परागत ढंग से नाचते-गाते हैं।

पंथी नृत्य की शुरूआत देवताओं की स्तुति से होती है। पंथी गीतों का प्रमुख विषय गुरु घासीदास का चरित्र होता है। इस नृत्य में आध्यात्मिक सन्देश के साथ मानव जीवन की महत्ता भी होती है। गुरु घासीदास के पंथ से पंथी नृत्य का नामकरण हुआ है पंथी नृत्य के मुख्य वाद्य मांदर एवं झांझ होते हैं।

इस नृत्य में मुख्य नर्तक पहले गीत की कड़ी उठाता है जिसे अन्य नर्तक दोहराते हुए नाचते हैं। नृत्य का आरम्भ धीमी गति से होता है पर जैसे-जैसे गीत और मृदंग की लय तेज होती है, वैसे-वैसे पंथी नर्तकों की आंगिक चेष्टाएं तेज होती जाती है और समापन तीव्र गति के साथ चरम पर होता है। वस्तुतः यह अत्यंत द्रुत गति का नृत्य है। इसमें गति और लय का अदभुत समन्वय होता है। इस नृत्य की तेजी , नर्तकों की तेजी से बदलती मुद्राएं एवं देहगति दर्शकों को आश्चर्यचकित कर देती है। इस नृत्य को देवदास बंजारे एवं उसके साथियों में देश-विदेश में काफी प्रतिष्ठित किया है।

  1. 5. करमा नृत्य : करमा नृत्य की परम्परा भारत की कई जनजातियों में देखने को मिलती है। छत्तीसगढ़ में गोंड, बैगा, उरांव, कमार, कवर, पंडो, बिंझवार, बिरहोर आदि जनजातियों में करमा नृत्य किया जाता है। करमा नृत्य गीत ‘कर्म देवता’ को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। करमा नृत्य गीतों में आदिवासियों के प्रेम, शृंगार के साथ प्रत्येक गतिविधियों की समसामयिक समग्र अभिव्यक्ति देखी जा सकती है। करमा मूलतः मुंडा और उरांव जनजाति का आदिम नृत्य है। करमा का विस्तार बस्तर, दन्तेवाड़ा, कांकेर, नारायणपुर एवं बीजापुर जिलों को छोड़कर राज्य के सभी जिलों तक है।

करमा कहीं पुरुषपरक और कहीं स्त्री पुरुष की समान भागीदारी का नृत्य है। जनजातियों के साथ साथ अन्य जातियों यथा-देवार, ढीमर, कुर्मी आदि में भी करमा नृत्य किया जाता है। करमा सर्वांग सुन्दर नृत्य है। करमा का केन्द्रीय वाद्य ‘मांदर’ है। बिंझवार जनजाति के लोग वर्षा के प्रारम्भ एवं समाप्ति पर करमा नृत्य करते हैं, जबकि बैगा जनजाति के लोग कभी भी यह नृत्य कर लेते हैं। प्रायः यह विजयादशमी से प्रारंभ होकर अगली वर्षा ऋतु के आरम्भ तक चलता है।

इसे खेतिहर संस्कृति के जीवन चक्र का हिस्सा कहा जा सकता है। इस नृत्य में प्राय : 8 पुरुष और 8 स्त्रियां भाग लेती हैं। युवक और युवतियां गोलार्ध बनाकर आमने-सामने खड़े हो जाते हैं। एक दल गीत की कड़ी उठाता है जबकि दूसरा दल उसे दोहराता है। नृत्य में युवक-युवती आगे-पीछे चलने में एक-दूसरे के अंगूठे को छूने की कोशिश करते हैं।

  1. 6. सैला नृत्य : सैला शुद्धतः जनजातीय नृत्य है। यह नृत्य आपसी प्रेम एवं भाई-चारे का प्रतीक है। “सैला’ का अर्थ ‘शैल’ या ‘डण्डा’ होता है। शैल-शिखरों पर रहने वाले लोगों द्वारा किए जाने के कारण इसका नाम ‘शैला’ (सैला) पड़ा। यह नृत्य दशहरे में आरम्भ होकर सम्पूर्ण शरद ऋतु की रातों तक चलता है। इस नृत्य का आयोजन अपने आदिदेव को करने हेतु किया जाता है। नृत्य का आयोजन चांदनी रातों में किया जाता है।

सैला नृत्य फसल कटने के बाद छत्तीसगढ़ के अधिकांश भाग में देखा जा सकता है। सैला नृत्य को ‘डण्डा नाच’ के नाम से भी जाना जाता है। यह नृत्य मूलतः पुरुषों द्वारा किया जाता है। इसमें नर्तक सादी वेशभूषा में हाथों में डण्डा लेकर एवं पैरों में धुंधरू बांध कर गोल घेरा बनाकर नृत्य करते हैं। इस अवसर पर दोहे भी बोले जाते हैं। सैला नृत्य की परिणति सर्प नृत्य के रूप में होती है। मांदर इस नृत्य का मुख्य वाद्य होता है। ग्रामों को सांस्कृतिक रूप से जोड़ने में सैला नृत्य की अहम भूमिका है। इस नृत्य का पुराना नाम ‘सैला-रीना’ है।

  1. परधोनी नृत्य : यह बैगा जनजाति का विवाह नृत्य है। बारात की अगवानी के समय खटिया, सूप, कम्बल आदि से हाथी बनाकर नचाया जाता है। हाथी पर समधी को बैठाकर गाते हुए नाचने की परम्परा है। हाथी के आगे दुल्हन होती है। इस नृत्य का मुख्य वाद्य ‘नगाड़ा’ एवं ‘टिमकी’ है।
  2. बिलमा नृत्य : बिलमा का अर्थ है : मिलन स्थान अर्थात धुलना-मिलना । यह गोंड और बैगा जनजातियों का एक लोकप्रिय नृत्य है। इस नृत्य का आयोजन दशहरा के अवसर पर होता है। इसमें स्त्री एवं पुरुष दोनों ही भाग लेते हैं।

यह नृत्य प्रायः शीत ऋतु में आयोजित होता है। एक गांव के युवक और युवतियां अलग-अलग समूह बनकार दूसरे गांव में नृत्य करने के लिए जातो हैं। बिलमा में प्रायः अविवाहित लड़कियां विशेष सजधज कर हिस्सा लेती है। ये युवतियां नृत्य करते-करते अपने जीवन साथी का चुनाव भी कर लेती हैं। इस प्रकार ये बिलमा के अर्थ को सार्थक बनाते हैं। इस नृत्य का मुख्य वाद्य मांदर है।

  1. फाग नृत्य : इस नृत्य का आयोजन गोंड एवं बैगा जनजातियों द्वारा होली के अवसर पर किया जाता है। इसमें गांव के सभी युवक-युवतियां तथा प्रौढ़ आदिवासी लोग अति उल्लास के साथ हिस्सा लेते हैं। इस सामूहिक नृत्य में एक या दो व्यक्ति लकड़ी के मुखौटे और हाथ में लकड़ी की चिड़िया आदि नचा-नचाकर भरपूर मनोरंजन करते हैं। इस नृत्य में मांदर, टिमकी आदि वाद्य यंत्रों का प्रयोग होता है।
  2. थापटी नृत्य : यह कोरकू जनजाति का परम्परागत लोकप्रिय नृत्य है। इस नृत्य में स्त्री एवं पुरुष दोनों ही भाग लेते हैं। चैत्र-वैशाख में कोरकू स्त्री-पुरुष यह सामूहिक नृत्य करते हैं। पुरुष हाथ में ‘पंचा’ और महिला अपने दोनों हाथों में ‘चिटकोरा’ बजाते हुए नृत्य करते हैं। इस नृत्य का मुख्य वाद्य ढोलक और बांसुरी है।

इस नृत्य में गोलाकार परिक्रमा करते हुए दाएं-बाएं झुक झुक कर नृत्य किया जाता है । गीतों की कड़ियों के साथ नर्तकों की पद-गति और हाथों के हाव-भाव थापटी नृत्य को मोहकता प्रदान करते हैं। ग्राम मल्हारगढ़ खंडवा के मोजीलाल कोरकू ने इस नृत्य को प्रतिष्ठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है।

  1. ककसार नृत्य : यह बस्तर की मुरिया जनजाति का लोकप्रिय पारम्परिक नृत्य है। यह एक मूलतः जात्रा नृत्य है। गांव के धार्मिक स्थल पर मुरिया आदिवासी वर्ष में एक बार ककसार यात्रा पर पूजा का आयोजन करते हैं। लिंगोपेन को प्रसन्न करने के लिए युवक और युवतियाँ अपनी साज-सज्जा करके सम्पूर्ण रात नृत्य-गायन करते हैं। पुरुष कमर में घंटी बाँधते हैं जबकि स्त्रियां सिर पर विभिन्न फूलों और मोतियों की मालाएं पहनती है।
  2. गेंडी नृत्य : यह बस्तर की मुरिया जनजाति का एक विशेष नृत्य है। इसमें बांस की बनी गेंडी पर चढ़कर नृत्य किया जाता है। यह एक पुरुष प्रधान नृत्य है। इसमें दो नर्तक टिमकी बजाते हैं और उनको घेरकर 8-10 युवक या इससे भी अधिक गेंडी पर चढ़कर लय गति के साथ नृत्य करते हैं। इस नृत्य में कोई गीत नहीं गाया जाता है।

गेंडी के बांसों के सहारे नर्तक कई तरह की आकर्षक और कठिन मुद्राएं संयोजित करते हैं । यह पूरी तरह से संतुलन का नृत्य है।

  1. गंवर नृत्य : यह बस्तर की माड़िया जनजाति का अत्यन्त लोकप्रिय नृत्य है। प्रसिद्ध मानवशास्त्री वेरियर एल्विन ने गंवर नृत्य को विश्व का सबसे सुन्दर नृत्य के रूप में निरूपित किया है। इस नृत्य के समय माड़िया युवक ‘गंवर’ नामक जंगली पशु और कौड़ियों से सुसज्जित मुकुट अपने सिर पर पहनते हैं। इस कारण इस नृत्य को ‘गंवर नृत्य’ कहा जाता है। इस नृत्य में युवतियां सिर पर पीतल का मुकुट और हाथ में लोहे की छड़ रखती है।

युवतियां तीव्र स्वर में गाती हुई नृत्य करती है और विभिन्न प्रकार की सुन्दर मुद्राएं बनाती है। इस नृत्य में युवतियों का अलग घेरा होता है और युवकों का अलग। नृत्य के दौरान युवतियां सर्प के समान घेरा बनाकर युवकों के घेरे को पार करती है। माड़िया युवक नृत्य के दौरान बाइसन हॉर्न की कई भंगिमाएं बनाने की कोशिश करते हैं। यह नृत्य वर्षा काल की अच्छी फसल और सुख सम्पन्नता को केन्द्र में रखकर किया जाता है ।सम्पूर्ण गांव इस समय आमोदमग्न होता है।

  1. दोरला नृत्य : दोरला बस्तर में पायी जाने वाली एक जनजाति है। इसी जनजाति के नाम पर इस नृत्य का यह नाम पड़ा है। दोरला जनजाति अपने विभिन्न पर्व-त्योहार विवाह आदि अवसरों पर इस पारम्परिक नृत्य का आयोजन करती है।

विवाह में पेण्हुल नृत्य करने की परिपाटी है। इस नृत्य में स्त्री एवं पुरुष दोनों ही भाग लेते हैं। पुरुष पंचे, कुसमा एवं रूमाल पहनते है जबकि स्त्रियां रहके और बट्टा पहनती है। इस नृत्य का मुख्य वाद्म एक विशेष प्रकार का ढोल होता है। बस्तर में भतरा, परजा एवं धुरवा जनजातियों में भी यह पारम्परिक नृत्य देखने की मिलता है।

  1. सरहुल नृत्य : यह उरांव और मुण्डा जनजातियों का आनुष्ठानिक नृत्य है। उरांव जनजाति के लोग वर्ष में चैत्र मास की पूर्णिमा के दिन ‘साल’ वृक्ष की पूजा का आयोजन करते हैं और उसके आस-पास नृत्य करते हैं। सरहुल एक सामुहिक नृत्य है।

इसमें युवक, युवती तथा प्रौढ़ सभी अत्यन्त उमंग और उल्लास के साथ भाग लेते हैं। इस नृत्य में पुरुष विशेष प्रकार का पीला साफा बाँधते हैं जबकि महिलाएं अपने जूड़ों में बगुले के पंख की कलगी लगाती हैं। इस नृत्य में पद-संचालन वाद्य की ताल पर नहीं बल्कि गीतों की लय और तोड़ पर होता है। इस नृत्य का मुख्य वाद्य मांदर एवं झांझ होता है।

  1. कोल दहका नृत्य : यह कोल जनजाति का पारम्परिक नृत्य है। इसे कोलहाई नाच भी कहते हैं। यह सरगुजा जिले के कोल जनजाति में प्रचलित है। इस नृत्य मे पुरुष गायक और वादक दोनों की भूमिका निभाता है। इसमें महिलाएं भी गाती हैं। गीत सवाल-जबाब शैली में होता है। महिलाएं सादी वेश-भूषा में नाचती है और साथ-साथ गाती भी है। महिलाओं के चेहरे पर चूंघट होता है। इस नृत्य के केन्द्र महिलाओं का नृत्य तथा पुरुषों का ढोल वादन होता है। इस नृत्य में उसे 6 तक ढोल तीव्रता के साथ बजायी जाती है।

झांझ की झंकार नृत्य को मधुरता प्रदान करती है। पुरुष उच्च स्वर में गाते हैं। बीच-बीच में जोर की हुंकार नृत्य को गति देती है। महिलाएं पैरों की गति के साथ हाथों की अंगुलियों को नचाते हुए नृत्य करती है। नृत्य करते समय वे कमर तक झुकती हैं। सम पर खड़ी होकर गोल घूमती है। ढोलक की गति जितनी तेज होती हैं, नृत्य उतना ही तेज होता है।

  1. दशहरा नृत्य : बैगा जनजाति यद्यपि दशहरा त्योहार नहीं मनाते हैं, किन्तु विजयादशमी से प्रारम्भ होने के कारण इस नृत्य का नाम दशहरा पड़ा। इस नृत्य को बैगा जनजातियों का आदि-नृत्य कहा जाता है। यह नृत्य अन्य नृत्यों का द्वार है। दशहरा नृत्य एक तरह से बैगा जनजातियों में सामाजिक व्यवहार की कलात्मक सम्पूर्ति है। यह नृत्य सैला नृत्य का एक सरल रूप है।
  2. अटारी नृत्य : यह बघेलखंड के भूमिया आदिवासियों का प्रमुख नृत्य है। यह नृत्य वर्तुलाकार होता है। एक पुरुष के कंधे पर दो आदमी आरूढ़ होते हैं। एक व्यक्ति ताली बजाते हुए भीतर-बाहर आता-जाता रहता है। इसमें वादक पार्श्व में रहते हैं।
  3. हुलकी नृत्य : हुलकी पाटा नृत्य का प्रचलन मुरिया जनजातियों में है। इसमें नृत्य के साथ-साथ गीत विशेष आकर्षण रखते हैं। इस नृत्य में युवक और युवतियां दोनों हिस्सा लेते हैं। इसमें यह गाया जाता है कि राजा-रानी कैसे रहते हैं ? अन्य गीतों में युवक और युवतियों की शारीरिक संरचना के प्रति सवाल-जबाब होते हैं। यह नृत्य किसी समय सीमा से नहीं बंधा होता है। इसका आयोजन किसी भी समय किया जा सकता है।
  4. ढांढल नृत्य : यह नृत्य कोरकू जनजाति में प्रचलित है। इसमें नृत्य के साथ शृंगार गीत भी गाए जाते हैं। इसमें नृत्य करते समय एक-दूसरे पर छोटे-छोटे डंडों से प्रहार किया जाता है। यह नृत्य ज्येष्ठ-आषाढ़ की रातों में आयोजित किया जाता है। इस नृत्य में दोलक, टिमकी, बांसुरी, मृदंग आदि बाद्य-यंत्रों का प्रयोग होता है। इन वाद्य यंत्रों के वादन की गति नृत्य की गति को नियंत्रित करती है।

21.राई नृत्य : बुंदेलखंड का यह नृत्य किसी ऋतु विशेष या अनुष्ठान से नहीं जुड़ा हुआ है। इसे न ही मंचीय नृत्य के रूप में सीमित किया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में बच्चे के जन्म, विवाह आदि अवसरों पर अथवा इच्छित कार्य की पूर्ति होने या मनौती पूरी होने पर राई नृत्य का आयोजन किया जाता है। राई नृत्य के केन्द्र में एक नर्तकी होती है, जिसे ‘बेड़नी’ कहते हैं। उसे गति देने का कार्य एक मृदंग वादक करता है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि राई के विराम काल में ‘स्वांग’ (सवाल-जबाब शैली में) का आयोजन होता है,

जिसमें घटनाओं, स्थितियों पर त्वरित व्यंग्य एवं सामजिक विद्रुपताओं पर चोट की जाती है। बुंदेलखंड की तरह ही बधेलखंड में भी राई नृत्य का प्रचलन है किन्तु दोनों क्षेत्रों की राई में बहुत अंतर है। बधेलखंड में राई विशेषकर अहीरों द्वारा की जाती है जबकि कहीं-कहीं ब्राह्मण स्त्रियों और पुत्र जन्म के अवसर पर वैश्य स्त्रियों द्वारा भी यह नृत्य किया जाता है। यहां के राई गीत शृंगार परक होते हैं। किन्तु बुन्देलखंड की तरह यौवन व शृंगार का अद्दाम आवेग और तीव्र गति यहां नहीं देखने को मिलता है।

 

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