छत्तीसगढ़ राज्य पर्यटन स्थल सामान्य ज्ञान CGPSC AND VYAPAM

By Raj Markam

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छत्तीसगढ़ राज्य पर्यटन स्थल

छत्तीसगढ़ का सम्पूर्ण सामान्य ज्ञान Cg Mcq Question Answer in Hindi: Click Now

प्रकृति की गोद में बसा होने के कारण छत्तीसगढ़ प्राकृतिक दृश्यों से भरा हुआ है। प्राचीन साम्राज्यों एवं राज्यों का केन्द्र स्थल होने के कारण यह राज्य अनेक ऐतिहासिक दर्शनीय स्थलों से परिपूर्ण है। साथ-ही-साथ धार्मिक सम्प्रदायों की उत्पत्ति एवं प्रचार-स्थली होने के कारण यहाँ अनेक धार्मिक तीर्थ स्थल है जहाँ भक्तजनों की भीड़ लगी रहती है। खनिज संसाधनों की प्रचुर उपलब्धता के कारण राज्य में अनेक प्रकार के उद्योगों का विकास हुआ है।

राज्य में इस कारण अनेक नगर वाणिज्यिक और औद्योगिक नगर के रूप में विकसित हुए हैं। यहाँ की सभ्यता, संस्कृति, रीति-रिवाज, मेले, त्योहार, वेशभूषाएँ, भाषा, नदियाँ, धार्मिक एवं ऐतिहासिक स्थल, इमारतें, विभिन्न प्रजातियों के वन्य-प्राणी आदि पर्यटकों को काफी आकर्षित करते हैं। पर्यटकों को मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध कराने की दिशा में राज्य सरकार द्वारा काफी प्रयत्न किए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्यटन स्थल निम्नलिखित हैं :

अबुझमाड़ : बस्तर के दक्षिण-पश्चिम में अधिकतम 4000 एवं न्यूनतम 2000 फुट ऊँची पर्वत श्रृंखला को अबुझमाड़ कहा जाता है। यह गोंडो की एक महत्वपूर्ण

उपजाति ‘अबुझमाड़िया’ का निवास स्थान है। यह छत्तीसगढ़ का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान माना जाता है। यह विशेष पिछड़ी अनुसूचित जनजाति अबुझमाड़िया की संस्कृतकी रक्षा के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित है। यहां सामान्य लोगों को प्रवेश करने के लिए विशेष अनुमति लेने की आवश्यकता होती है। यहाँ की अबुझमाड़िया जनजाति अभी भी आदिम स्थिति में है।

2. आरंग : यह रायपुर से संबलपुर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 6 पर रायपुर से 37 किमी दूरी पर स्थित एक प्राचीन नगरी है। यहाँ ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्व के अनेक मंदिर स्थित हैं। इसलिए आरंग को ‘मन्दिरों की नगरी’ कहा जाता है।

इस नगर का उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। यहाँ भांडदेवल मंदिर, बाघ-देवल मंदिर, महामाया मंदिर, पंचमुखी महादेव मंदिर, हनुमान मंदिर आदि दर्शनीय हैं। भांड देवल मंदिर 12वीं सदी में निर्मित है। यहाँ से अनेक जैन तीर्थकरों की प्रतिमाएं प्राप्त हुई है। इस मंदिर में भाई-बहन एक साथ प्रवेश नहीं करते ऐसी जनश्रुति है।

3. कांकेर : यह नगर सोमवंशी शाखा की राजधानी थी। इसका प्राचीन नाम काकरय था। यहाँ सिंहवासिनी का मंदिर बालाजी का मंदिर, लक्ष्मी नारायण मंदिर, कंकालिन मंदिर, शीतला मंदिर, गढ़िया पहाड़ तथा जोगी गुफा दर्शनीय स्थल है।

4. कबरा पहाड़ : रायगढ़ से 8 किमी. पूर्व में स्थित यह अपने शैल-चित्रों के कारण जाना जाता है।

5. कवर्धा : यह फणि नागवंशियों का अंचल रहा है।

6. कुटुमसर : जगदलपुर से 4 किमी. दक्षिण में स्थित यह चूने की गुफाओं के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की गुफाएँ काफी गहरी हैं। इनके द्वार इतने छोटे और गोलाकार है कि एक बार में एक ही व्यक्ति अंदर जा सकता है।

7. कुटुरमाल : यह ग्राम चांपा स्टेशन से 17 मील दूर स्थित है। यहाँ कबीर साहब के सुप्रसिद्ध शिष्य धर्मदास के पुत्र वचन चूड़ामन साहब की समाधि है। यहाँ प्रतिवर्ष माघ माह में कबीर पंथियों का मेला लगता है।

8. कुनकुरी : जशपुर जिले में जशपुर नगर से 44 किमी. की दूरी पर अवस्थित यह एक विशाल गिरजाघर के लिए प्रसिद्ध है। यह चर्च देश-विदेश में प्रसिद्ध है । यह कैथोलिक ईसाईयों का पवित्र स्थान है। 69. केशकाल : केशकाल की घाटी को ‘बस्तर का प्रवेश द्वार’ कहा जाता है। यहाँ घाटी के मध्य में ‘तेलिन माता का मंदिर’ है जहाँ यात्रियों को अनिवार्य रूप से ठहरना होता है।

10. कोरबा : चांपा जंक्शन से 40 किमी. की दूरी पर स्थित कोरबा छत्तीसगढ़ का प्रमुख औद्योगिक नगर है। यह बिलासपुर से 112 किमी. दूर स्थित है। इसे ‘छत्तीसगढ़ की ऊर्जा नगरी’ के नाम से जाना जाता है।

11.खरौद : अपनी पौराणिक एवं ऐतिहासिक विशेषताओं से परिपूर्ण यह कस्बा महानदी के सुरम्य तट पर बसा हुआ है। यहाँ अनेक तालाब और मंदिर हैं। सोमवंशी राजाओं द्वारा निर्मित लक्ष्मणेश्वर महादेव मंदिर यहाँ का प्रसिद्ध मंदिर है। इसे ‘छत्तीसगढ़ का काशी’ कहा जाता है।

 12. खल्लारी : इसका प्राचीन नाम खल्वाटिका था। महासमुन्द जिला से लगभग 22 किमी. की दूरी पर स्थित इस ग्राम के पास एक छोटी पहाड़ी पर एक शिलाखंड है जो सती स्तम्भ का एक भाग प्रतीत होता है। यह सिन्दूर से पुता हुआ है जिसे यहाँ की जनता खल्लारी माता के रूप में इसकी पूजा करते हैं। चैत्र माह में पूर्णिमा के अवसर पर इस ग्राम में देवी के सम्मान में एक वार्षिक मेला लगता है जो 7 दिनों तक चलता है।

13. चम्पारण्य : रायपुर से 60 किमी. दूर गरियाबंद जिले में स्थित चम्पारण्य वैष्णव सम्प्रदाय के प्रवर्तक वल्लभाचार्य जी जन्म स्थली होने के कारण यह उनके अनुयायियों का प्रमुख दर्शनीय स्थल है। यह राजिम से मात्र 9 किमी. की दूरी पर स्थित है।

यहाँ अरण्य के बीच चम्पकेश्वर महादेव का एक प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर के शिवलिंग के ऊपर दो रेखाएँ उत्कीर्ण है, जिससे यह तीन भागों में विभाजित हो गया है। ऊपर के भाग में गणेशजी की छवि उत्कीर्ण है । मध्य भाग शिवजी का प्रतिनिधित्व करता है

और निम्न भाग पार्वती जी का । यहाँ स्त्रियों को अपना बाल खोले रखना पड़ता है। यहाँ गर्भवती स्त्रियों के आने की मनाही है।

14. चांपा : यह बिलासपुर हावड़ा रेलमार्ग पर हसदो नदी के तट पर बसा हुआ है। यह नगर कोसा (तसर) तथा स्वर्ण निर्मित वस्तुओं के लिए प्रसिद्ध है।

15. चित्रकूट प्रपात : यह जगदलपुर से 38.4 किमी. की दूरी पर स्थित है। यहाँ 150 फीट की ऊँचाई से जल गिरता है। इस प्रपात का ‘घर-घर’ स्वर बहुत दूर तक सुनाई देता है। प्रपात से नीचे गिरता जल सहस्त्रों धाराओं में विभक्त हो जाता है। यह प्रपात ‘छत्तीसगढ़ का नियाग्रा’ के नाम से प्रसिद्ध है।

16. जगदलपुर : यह प्राचीन बस्तर राज्य की राजधानी रहा है। यहाँ राजमहल के सिंहद्वार पर दंतेश्वरी मंदिर है, जिसके कपाट पर कलात्मक कार्य हुआ है। यहाँ का दशहरा प्रसिद्ध है। टा

17. जांजगीर : यह बिलासपुर-हावड़ा रेलमार्ग के नैला स्टेशन से 2 मील दूर स्थित है। यहाँ का जाजल्लदेव प्रथम द्वारा निर्माण कराया गया अपूर्ण मंदिर का शिल्प देखने योग्य है। यह मंदिर भिम्मा नामक एक भारी तालाब के किनारे अपूर्ण और मूर्तिविहीन दशा में भी शान के साथ खड़ा है। जांजगीर नाम वस्तुतः जाजल्वनगरी का बिगड़ा हुआ रूप जान पड़ता है।

18. डीपाडीह : यह सरगुजा जिले की सामरी तहसील का एक ग्राम है। यह सामरी से दक्षिण-पश्चिम में 46 किमी. की दूरी पर अवस्थित है। गाँव से लगभग डेढ़ मील की दूरी पर मंदिरों तथा तालाबों का यहाँ भग्नावशेष है।

19. डोंगरगढ़ : यह हावड़ा-मुम्बई रेलमार्ग पर राजनांदगांव से 57 किमी. की दूरी पर स्थित है। यहाँ पहाड़ी के ऊपर माँ बम्लेश्वरी का विशाल मंदिर है। नवरात्रि में यहाँ अपार जनसमूह दर्शनार्थ आते हैं। यहाँ प्रतिवर्ष नवरात्रि के अवसर पर मेला लगता है। इस मंदिर का निर्माण राजा कामदेव ने कराया था। इस क्षेत्र में बम्लेश्वरी देवी का व्यापक धार्मिक महत्व है।

20. तातापानी : सरगुजा जिले के मुख्यालय अम्बिकापुर से 80 किमी. की दूरी पर उष्ण जल के 8-10 भूस्रोत हैं, जो तातापानी के नाम से जाने जाते हैं। इसके जल का तापमान 84° सेन्टीग्रेड के लगभग होता है। यह एक प्राकृतिक उष्ण झरना है तथा जल में सल्फर की विद्यमानता के कारण यह चर्मरोगों के निदान में लाभदायक है। यह बलरामपुर जिले में स्थित है।

21. तालागांव : छत्तीसगढ़ के प्रमुख पुरातात्विक स्थलों में से एक तालागांव बिलासपुर से 30 किमी. दूर मनियारी नदी के तट पर स्थित है। तालागांव में चौथी-पांचवीं शताब्दी के दो मंदिर तथा अद्भुत रूद्र शिव की प्रतिमा उल्लेखनीय है। मनियारी नदी के किनारे यहाँ दो मंदिर अवस्थित है जिन्हें ‘देवरानी-जेठानी मंदिर’ कहा जाता है।

यह गुप्तकालीन स्थापत्य का नमूना है। यहीं जलेश्वर शिव का भी मंदिर है। देवरानी मंदिर के द्वार पर उत्खनन के दौरान शिव के रौद्र रूप की अनुपम कृति मिली है। इस प्रतिमा के 11 अंग विभिन्न प्राणियों के द्वारा निर्मित हैं। यह सात फुट ऊंची, चार फुट चौड़ी और छह टन वजन की लाल बलुए पत्थर से बनी है।

22. तीरथगढ़ : जगदलपुर से 38 किमी. की दूरी पर तीरथगढ़ का जलप्रपात स्थित है। यह जलप्रपात बस्तर के जलप्रपातों का सिरमौर कहलाता है। यहाँ 300 फीट की ऊँचाई से जलधारा नीचे गिरती है और गिरते समय वह अनेक खंडों में बंट जाती है। तीरथगढ़ नामक गांव में प्राचीन किले के अवशेष और शिव मंदिर हैं।

23. तुरतुरिया : यह रायपुर से 50 मील तथा सिरपुर से लगभग 15 मील की दूरी पर स्थित है। इसकी गणना राज्य के प्रमुख तीर्थ स्थलों में की जाती है। यह बहरिया नामक ग्राम से लगा हुआ बलमदी नाला पर स्थित है। कहा जाता है कि पर्वत की कुछ चट्टानों की दरारों में से पानी का झरना फूट निकलने के कारण इसका नाम तुरतुरिया पड़ा।

यह झरना एक गहरी गुफा से निकलता है। झरना की धारा के निकट दो शूरवीरों की मूर्तियाँ हैं जिनमें से एक शूरवीर तलवार उठाए हुए उस सिंह को मारने के लिए उद्यत है, जो उसकी दाहिनी भुजा को फाड़ रहा है। दूसरी मूर्ति एक जानवर को उसकी पिछली टांगों पर खड़ा होकर उसका गला मरोड़ रही है। यहाँ पत्थर के कई स्तम्भ यत्र-तत्र बिखरे हुए पड़े हैं जिन पर उत्कृष्ट खुदाव का काम किया हुआ है। यहाँ के कुछ भग्न मंदिरों में बुद्ध की मूर्तियाँ उत्कीर्ण है। इन मूर्तियों में बुद्ध उपदेश देने की मुद्रा में दिखाए गए हैं। साथ ही उनकी शिक्षाएँ भी यहाँ उत्कीर्ण है।

24. दन्तेवाड़ा : यह जगदलपुर से 85 किमी. की दूरी पर स्थित है। जगदलपुर तथा बस्तर नरेशों की आराध्य इस क्षेत्र में सर्वाधिक धार्मिक विश्वास एवं श्रद्धा की प्रतीक ‘दन्तेश्वरी देवी’ हैं। शंखिनी और डंकिनी नदियों के संगम पर स्थित रानी भाग्येश्वरी देवी द्वारा निर्मित यह मंदिर दर्शनीय है। नवरात्रि के अवसर पर यहाँ एक विशाल मेला लगता है।

25. दामाखेड़ा : बलौदा बाजार तहसील का यह बड़ा ग्राम रायपुर से सिमगा होकर बिलासपुर जाने वाली सड़क पर स्थित है। यह रायपुर और सिमगा के उत्तर-पूर्व में क्रमशः लगभग 50 किमी. तथा 8 किमी. की दूरी पर स्थित है। यह कबीरपंथ का प्रमुख स्थान है।

– 26. देव बालौद : यह दुरुग नगर से लगभग 14 मील दूर है। यह भिलाई रेलवे स्टेशन से 2 मील की दूरी पर स्थित है। यहाँ शिवाजी का एक भग्न मंदिर है। इस मंदिर में विविध प्रसंग की अनेक मूर्तियाँ हैं। एक स्थान पर रीछ का आखेट करते हुए दिखाया गया है जो बहुत ही आकर्षक है।

दीवालों के कई स्थानों पर रीछ का रूप उत्कीर्ण किया गया है, जिन्हें मारने के लिए शिकारी हाथों में बरछा लिए हुए है। मंदिर के भीतर चार स्तम्भों पर उत्कीर्ण मूर्तियों तथा प्रवेश द्वार के चौखट पर शिल्प का श्रेष्ठ काम किया गया है और उन पर की गई पॉलिश भी उत्कृष्ट है। इसके प्रवेश द्वार के ऊपर गणेशजी की मूर्ति स्थापित है और उसके ऊपर सरस्वती जी की।

 27. धमतरी : यह रायपुर से 48 मील दक्षिण में स्थित है। यहाँ कुछ प्राचीन मंदिर हैं जिनमें से श्री रामचन्द्र का मंदिर प्रसिद्ध है। 5_28. नगपुरा : दुर्ग जिला मुख्यालय से 14 किमी. दूर स्थित नगपुरा जैन धर्मावलम्बियों का प्रमुख तीर्थस्थल है।

29. नारायणपुर : यह स्थान वार्षिक मेले (मड़ई) के कारण विशेष रूप से जाना जाता है। इस मेले में आदिम संस्कृति जीवन्त हो उठती है।

30. पाली : यह ऐतिहासिक ग्राम कोरबा जिले के अंतर्गत बिलासपुर कोरबा सड़क मार्ग पर बिलासपुर से लगभग 43 किमी. की दूरी पर स्थित है। यहाँ जलाशय के समीप स्थित प्राचीन शिव मंदिर दर्शनीय है। यह लगभग 1000 वर्ष पुराना मंदिर है जिसे बाण वंश के राजा विक्रमादित्य ने बनवाया था। मंदिर का स्थापत्य एवं उकेरी गयी मूर्तियाँ बहुत ही सुंदर है।

31. बारसूर : यह जगदलपुर से गीदम होकर 116 किमी. की दूरी पर स्थित है। पूर्व में यह नागवंशी शासकों की राजधानी थी। यह अपने विशाल शिव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यहीं पर मामा-भांजा का मंदिर है। बारसूर में महिषा सुरमर्दिनी की सुन्दर मूर्ति है। यहा गणेशजी की भी विशालकाय मूर्ति है।

32. बिलासपुर : इस नगर को ‘बिलास’ नामक एक केवंटिन ने बसाया था। इस पतिव्रता नारी ने एक आततायी से त्राण पाने हेतु जलकर अपने प्राण त्याग दिए थे। उसी की स्मृति में पहले एक गांव यहां बसा जो कालान्तर में बढ़ते-बढ़ते नगर में परिवर्तित हो गया। वर्तमान में यह दक्षिण-पूर्व मध्य रेलवे (SECR) परिक्षेत्र का मुख्यालय है। छत्तीसगढ़ राज्य का उच्च न्यायालय भी बिलासपुर में ही स्थित है।

33. बैलाडीला : यह बस्तर की प्रमुख पर्वत श्रृंखला है। यहाँ लौह-अयस्क की विश्वप्रसिद्ध खाने हैं। यह दंतेवाड़ा जिले में स्थित है।

34. भिलाई : यह राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 6 पर रायपुर से 25 किमी. की दूरी पर स्थित है। यह मुम्बई-हावड़ा रेलमार्ग पर स्थित राज्य का प्रमुख औद्योगिक नगर है। यहाँ भारतीय इस्पात प्राधिकरण लिमिटेड का विशाल लौह-इस्पात कारखाना है जिसकी स्थापना पूर्व सोवियत संघ के सहयोग से की गई है। यह शहर 14 सैक्टरों में विभाजित है।

35. भोरमदेव : भोरमदेव के शिव मंदिर को ‘छतीसगढ़ का खजुराहो’ कहा जाता है। यह कवर्धा जिले के मुख्यालय से उत्तर-पूर्व की ओर छपरी नामक ग्राम के पास चौरागांव में स्थित है। मंदिर की मिथुन प्रतिमाएँ वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है। खजुराहो तथा कोणार्क की कला का संगम भोरमदेव मंदिर में है।

इसे 1089 ई० के आसपास छठे नागवंशी शासक गोपाल देव ने बनवाया था। यह नागर शैली का अनुपम उदाहरण है। यह मंदिर 5 फुट उँचे अधिष्ठान पर स्थित है। गर्भगृह में शिवलिंग की स्थापना की गई है। भोरमदेव मंदिर छत्तीसगढ़ के स्थापत्य एवं मूर्तिकला का अनुपम उदाहरण है। यहाँ के शिल्पों में विभिन्न रति क्रियाओं में निरत युगलों का कलात्मक चित्रण है।

36. मड़वा महल : यह भोरमदेव से एक किमी. दूर कवर्धा मार्ग पर स्थित है। मड़वा महल को ‘दुल्हादेव’ भी कहा जाता है। इस मंदिर को नागवंशी शासक राजा रामचन्द्र देव ने 1349 ई० में बनवाया था। मड़वा महल की बाहरी दीवारों पर चारों ओर 54 विभिन्न रति क्रियाओं से युक्त प्रतिमाएँ उत्कीर्ण है।

37. मल्हार : बिलासपुर जिले में अवस्थित यह पुरातात्विक महत्व का एक गांव है। यह जिला मुख्यालय बिलासपुर से 32 किमी. दूर दक्षिण- पूर्व में जोंधरा मार्ग पर स्थित है। भारत वर्ष के 52 सिद्ध शक्तिपीठों में से 51वां शक्तिपीठ मल्हार में स्थापित है। यहां उत्खनन से प्राप्त पातालेश्वर मंदिर, देउरी मंदिर एवं डिडनेश्वरी मंदिर विशेष रूप से दर्शनीय है।

डिडनेश्वरी मंदिर विश्व विख्यात है। 1954 ई० में इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया। मंदिर के अंदर एक ऊँचे संगमरमर के आसन पर स्थापित डिडनेश्वरी देवी की प्रतिमा मूर्तिकला का सर्वोत्तम नमूना है। यह प्रतिमा अत्यंत कीमती एवं शुद्ध काले ग्रेनाइट से निर्मित है। मल्हार में देश की प्राचीनतम चतुर्भुज विष्णु प्रतिमा भी देखी जा सकती है। यहां एक संग्रहालय भी है जिसमें वैष्णव, शैव एवं जैन सम्प्रदाय की प्रतिमाएँ रखी हुई है। पुरातात्विक महत्व के इस गांव का प्राचीन नाम ‘मल्लारिपत्तन’ था।

38. महासमुंद : यह रायपुर के दक्षिण-पूर्व में लगभग 55 किमी. की दूरी पर रायपुरजगदलपुर-विजयानगरम राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है। यहाँ दो प्राचीन शिव मंदिर हैं, जिनका निर्माण ग्रेनाइट और लैटराइट पत्थरों से संभवतः 14वीं शताब्दी में किया गया था। इसका निर्माण सरल स्थूल शैली में बिना गारे का किया गया है। यहाँ अनेक तालाब हैं, जिनमें से सबसे बड़ा तालाब शहर के पास है जी आजकल बहुत दलदली हो गया है। संभवतः इस तालाब के आधार पर ही इसका नाम महासमुन्द (विशाल सुमद्र की भांति तालाब) पडा है।

39. मैनपाट : यह सरगुजा जिला मुख्यालय से 75 किमी. पूर्वोत्तर में स्थित एक पठारी क्षेत्र है। लगभग 25 वर्ग किमी. क्षेत्र में फैला यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ का एकमात्र पर्वतीय सैरगाह है। समुद्र तल से इसकी ऊँचाई 4000 फुट है। यहां स्थित 150 फुट ऊँचा सरभंजा जलप्रपात पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र है।

यहाँ तिब्बती शरणार्थियों को बसाया गया है। इसे ‘छत्तीसगढ़ का शिमला’ कहा जाता है। यहाँ ऊन एवं चमड़े का सामान मिलता है। मैनपाट के मतरिंगा पहाड़ से रिहन्द नदी निकलती है।

40. रतनपुर : बिलासपुर से 26 किमी. की दूरी पर स्थित यह एक धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व का स्थान है। इस स्थान का उल्लेख महाभारत ग्रंथ में भी मिलता है। महाभारत में इसका नाम रत्नावलीपुरी मिलता है। महाभारत में उल्लिखित ताम्रध्वजमोरध्वज वाली घटना यहीं हुई थी। यह कलुचरी राजाओं की सशक्त राजधानी हुआ करती थी। यह नगर राजा रतनदेव द्वारा बनवाया गया। यहाँ अनेक सुन्दर पुराने मंदिर, जलाशय और प्राचीन किलों के अवशेष हैं। यहाँ के दर्शनीय स्थलों में सिद्ध शक्तिपीठ महामाया मंदिर, रामटेक मंदिर, कण्ठीदेवल शिव मंदिर आदि मुख्य हैं। इसे ‘तालाबों की नगरी’ कहा जाता है।

41. राजिम यह रायपुर से 48 किमी. दूर महानदी, पैरी तथा सोंदुल नदियों के संगम पर स्थित है। इसे ‘छत्तीसगढ़ का प्रयाग’, ‘छत्तीसगढ़ का महातीर्थ’ तथा ‘छत्तीसगढ़ का संस्कार धानी’ कहा जाता है। इसका प्राचीन नाम ‘कमल क्षेत्र’ या ‘पदमपुर’ था ।

यहाँ कई प्रमुख दर्शनीय मंदिरें हैं : कुलेश्वर महादेव मंदिर, राजीव लोचन मंदिर, राजेश्वर मंदिर, पंचेश्वर महादेव मंदिर, जगन्नाथ मंदिर, भूलेश्वर महादेव मंदिर, वामन बाराह मंदिर, नरसिंह मंदिर,बद्रीनाथ मंदिर, राजिम-तेलिन का मंदिर, दानेश्वर मंदिर, रामचंद्र मंदिर तथा सोमेश्वर महादेव मंदिर । इन मंदिरों में राजीव लोचन मंदिर सबसे प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर का जीर्णोद्धार जगतपाल ने कराया था। ऐसी मान्यता है कि जगन्नाथपुरी की यात्रा

तब तक सम्पूर्ण नहीं मानी जाती है जब तक राजिम की यात्रा नहीं कर ली जाती। यह गरियाबंद जिले में स्थित है।

42. रामगढ़ पहाड़ी : रामगढ़ की पहाड़ी अपनी नाट्यशाला, चित्रशाला तथा अभिलेखों के लिए प्रसिद्ध है। रामगढ़ की पहाड़ी के हथफोड पौरी दरवाजा, कबीर चौरा सिंह दरवाजा, रावण दरवाजा, सीता बेंगरा, नाट्यशाला, अभिलेखागार, जोगीमाड़ा आदि राज्य के पुरातत्व की अनमोल धरोहरें हैं।

43. लाफागढ़ : यह पहाड़ी ‘छत्तीसगढ़ का चित्तौड़गढ़’ के नाम से प्रसिद्ध है। इसकी ऊँचाई 3240 फुट है। यह मेकाल की सबसे ऊंची श्रेणी है। इसकी चोटी पर एक पुराना किला है जिसके 3 फाटक हैं। ये फाटक खम्भों और मूर्तियों से खूब सुसज्जित हैं। यहाँ सिंह द्वार के समीप महामाया का एक सादा सा मंदिर है। मेनका नामक द्वार के समीप एक गुफा है, जिसमें शिवलिंग स्थापित है। पहाड़ी के ऊपर 4 तालाब हैं। जटाशंकरी नदी यहीं से निकली है।

44. लुतरा लतीफ : बिलासपुर-बलौदा मार्ग पर बिलासपुर से लगभग 32 किमी. उत्तरपूर्व स्थित यह मुसलमानों का प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। यहाँ हजरत बाबा सैय्यद इन्सान अली की दरगाह है। यहाँ दशनार्थ अन्य धर्मावलम्बियों के लोग भी आते हैं। यहाँ वर्ष में एक बार उर्स का आयोजन होता है।

45. सिरपुर : सिरपुर का प्राचीन नाम ‘श्रीपुर’ है, जिसका अर्थ ‘समृद्धि की नगरी’ होता है। यह सम्बलपुर जाने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या : 6 पर आरंग के पश्चात आगे की ओर 24 किमी. के बाद बायीं ओर मुड़कर 16 किमी. की दूरी पर स्थित है। सिरपुर किसी समय दक्षिण कोसल की राजधानी थी। यह सोमवंशीय शासकों की सत्ता का केन्द्र था। यह प्राचीन समय में एक महत्वपूर्ण बौद्ध नगरी थी। लगभग 1100 वर्ष पुराना पूर्णतः ईंटों से निर्मित लक्ष्मण मंदिर, राम मंदिर, गन्धेश्वर मंदिर, बौद्ध विहार आदि सिरपुर के विशेष आकर्षण के केन्द्र हैं।

46. शिवरीनारायण : यह जांजगीर-चांपा जिले में स्थित है। यहाँ महानदी, शिवनाथ एवं जोंक नदी का त्रिवेणी संगम है। दंत कथाओं के अनुसार राम ने शबरी के जूठे बेर इसी स्थान पर खाए थे। यहाँ के दर्शनीय मंदिरों में नारायण मंदिर, चन्द्रबुद्धेश्वर मंदिर, तथा लखनेश्वर शिव मंदिर प्रमुख हैं । नारायण मंदिर के पास प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि के अवसर पर मेला लगता है।

47. सिहावा : यह धमतरी से 44 मील दूर वन और पहाड़ियों से घिरा हुआ एक ग्राम है। यह महानदी का उदगम स्थल भी है। इस ग्राम में तीन बड़े व तीन छोटे मंदिर हैं। कांकेर राज परिवार का दृढ़ मत है कि जगन्नाथ पुरी का कुष्ठ रोगी राजा सिहावा यहाँ आकर बस गया था, जहाँ उस समय घना जंगल था। यहाँ उसने झरने में स्नान किया और उसने कुष्ठ रोग से मुक्ति मिल गई। बाद में उसे यहाँ का राजा बना दिया गया। संभवतः उसी राजा के नाम पर इस स्थान का नाम ‘सिहावा’ पड़ा।

48.खैरागढ़ : यहाँ प्रदेश का एकमात्र कला एवं संगीत विश्वविद्यालय है। विश्वविद्यालय से सम्बद्ध दो संग्रहालय हैं। खैरागढ़ के आसपास पुरातत्वीय उत्खनन से प्राप्त सुंदर मूर्तियों का एक पुरातत्वीय संग्रहालय है। दूसरा संग्रहालय मुख्यतः पुराने वाद्ययंत्रों का संकलन प्रदर्शित करता है। खैरागढ़ में एक विशालकाय मंदिर है जो ‘रूखड़स्वामी’ के नाम से समर्पित है। इस मंदिर को टिकैतराय ने बनवाया है।

49. गिरौधपुरी : यह सतनामी समाज का प्रमुख तीर्थ स्थल है। यहाँ के दर्शनीय स्थलों में गुरु घासीदास का निवास स्थान, चरण कुण्ड, अमृतकुण्ड, छाता पहाड़ आदि प्रमुख हैं। यहाँ प्रतिवर्ष फाल्गुन मास की पंचमी से लेकर सप्तमी तक मेला लगता है। यह स्थान बिलासपुर से शिवरीनारायण होकर लगभग 80 किमी. दूर महानदी पर रायपुर जिला में स्थित है।

50. रामगढ़ : यह बिलासपुर अम्बिकापुर मार्ग पर बिलासपुर से 100 किमी. तथा अम्बिकापुर से 40 किमी. की दूरी पर स्थित है। किवदन्तियों के अनुसार यह स्थान राम कथा से जुड़ा हुआ है। ऐसी आस्था है कि वनवास के दौरान राम, लक्ष्मण तथा सीता इस स्थान पर रूके थे।

51. चैतुरगढ़ : दुर्गम भौगोलिक अवस्थिति के कारण यहाँ के किले को देश के अभेद्य किलों में शामिल किया गया है। यह दुर्गम पहाड़ियों एवं सघन वनों से आच्छादित है। वर्ष भर हरियाली और शीतल जलवायु के कारण इसे ‘छत्तीसगढ़ का कश्मीर’ कहा जाता है।

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